भारतीय शेयर बाजार ने एक रिकॉर्ड बनाया है, लेकिन ऐसा रिकॉर्ड जिसकी उम्मीद निवेशकों को नहीं थी. दलाल स्ट्रीट में लगातार आठ हफ्तों तक गिरावट देखी गई है, जो पिछले 25 सालों में पहली बार हुआ है. यह गिरावट 2020 के कोविड19 क्रैश और 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के दौरान देखी गई गिरावट से भी ज्यादा है. तेल की बढ़ती कीमतें, बॉन्ड यील्ड में तेजी और महंगाई की चिंता ने बाजार के सेंटीमेंट को कमजोर कर दिया है, जिससे भारतीय इक्विटी में जबरदस्त बिकवाली हुई है. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर वो 5 ऐसे कौन से कारण हैं, जिनकी वजह से अगले हफ्ते शेयर में उतार चढ़ाव देखने को मिल सकता है.

तेल की कीमतें
इस हफ्ते तेल की कीमतें कुछ कम रहीं क्योंकि यूरोपीय लीडर्स अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस अपील पर सहमत हो गए हैं जिसमें फ्यूल की कीमतें कम करने और अमेरिका से फ्यूल का आयात घटाने के लिए डीजल रिजर्व जारी करने को कहा गया था. लेकिन एनालिस्ट अभी भी चिंता में हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। जेपी मॉर्गन के एनालिस्ट ने कहा कि हमें बस यह नहीं पता कि इस स्थिति के अंत का मॉडल कैसे बनाया जाए.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह टकराव आगे कैसे बढ़ेगा, इसे लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. जब यह टकराव शुरू हुआ था, तो बैंक ने माना था कि कुछ आर्थिक सीमाएं ऐसी हैं जिन्हें अमेरिकी प्रशासन पार नहीं करेगा. युद्ध के छह महीने बाद, जेपी मॉर्गन ने कहा कि उनमें से कई सीमाएं पार हो चुकी हैं, जबकि अभी भी कोई स्पष्ट एग्जिट स्ट्रैटेजी नहीं है.
सप्लाई में और रुकावट आने के जोखिम ने तेल की कीमतें बढ़ने की संभावना भी बढ़ा दी है. गोल्डमैन सैक्स में ग्लोबल कमोडिटीज रिसर्च के कोहेड डान स्ट्रुवेन ने कहा कि हालिया हमलों से पता चला है कि शिपिंग में रुकावटें फैल सकती हैं और ज्यादा गंभीर हो सकती हैं. गोल्डमैन सैक्स ने एक ऐसी स्थिति का अनुमान लगाया है जिसमें अगर मिडिल ईस्ट में जहाजों पर हमले तेज होते हैं, तो तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती हैं. अगर एक्सपोर्ट सामान्य हो जाता है, तो बैंक को उम्मीद है कि तेल की कीमतें वापस 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ जाएंगी.
बॉन्ड यील्ड
10साल की US ट्रेजरी यील्ड, जो दुनिया भर में उधार लेने की कॉस्ट और एसेट की कीमतों का पैमाना है, बढ़कर 5.34 फीसदी हो गई है. यह 2002 के बाद से इसका सबसे ऊंचा स्तर है. 10साल की US ट्रेजरी यील्ड में तेज बढ़ोतरी भारतीय शेयरों पर दबाव डाल सकती है क्योंकि यह जोखिम भरे उभरते बाजारों के एसेट की तुलना में US सरकारी बॉन्ड को अधिक आकर्षक बनाती है. US यील्ड बढ़ने से ग्लोबल निवेशक भारत जैसे बाजारों से पैसा निकालने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं, जिससे रुपए और इक्विटी पर दबाव पड़ सकता है. रुपए के कमजोर होने से आयात की लागत और बढ़ सकती है, खासकर उन कंपनियों के लिए जो कच्चे तेल और अन्य विदेशी इनपुट पर निर्भर हैं.
FII की बिकवाली और बढ़ी
FII ने सिर्फ छह ट्रेडिंग सेशन में 43,687 करोड़ रुपए की बिकवाली की है, और पिछले तीन सेशन में यह बिकवाली तेज हुई है. उनका इंडेक्स फ्यूचर्स लॉन्गशॉर्ट रेश्यो गिरकर 8.01 फीसदी हो गया है, जो उनके ऐतिहासिक दायरे के निचले स्तर के करीब है. मौजूदा ग्लोबल ब्याज दर के माहौल में विदेशी बिकवाली समझ में आती है. जानकारों का कहना है कि 10साल के US बॉन्ड यील्ड के 5.2% के आसपास रहने के संदर्भ में, FII की यह बिकवाली एक तर्कसंगत कदम है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ट्रेड के चरम पर पहुंचने के बाद भी विदेशी निवेशकों के बड़ी संख्या में भारतीय इक्विटी में लौटने की संभावना कम है. बर्नस्टीन ने एक रिपोर्ट में कहा कि विदेशी निवेश में लगातार सुधार इस बात पर निर्भर करता है कि भारत सेमीकंडक्टर, बैटरी और एनर्जी स्टोरेज जैसे क्षेत्रों में विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्योग बनाने में कितना सक्षम है.
Q2 की कमाई
TCS और DMart उन 21 कंपनियों में शामिल हैं जो कमाई के सीजन की आधिकारिक शुरुआत करते हुए अपनी Q2 की कमाई की घोषणा करेंगी. इससे बाजार के मूड का अहम अंदाज़ा लग सकता है, खासकर तब जब निवेशक अस्थिर ग्लोबल माहौल के बीच कॉर्पोरेट कमाई में मजबूती के संकेत ढूंढ रहे हों. TCS के नतीजों में रेवेन्यू ग्रोथ, डील मिलने, मार्जिन और IT खर्च पर मैनेजमेंट की टिप्पणी पर नजर रहेगी, जबकि DMart के आंकड़े कंज्यूमर डिमांड, सेल्स ग्रोथ और ऑपरेटिंग मार्जिन के बारे में जानकारी देंगे. दोनों में से किसी भी नतीजे में उम्मीद से ज्यादा अंतर होने पर न सिर्फ संबंधित शेयरों के प्रति, बल्कि पूरे IT और कंजम्पशन सेक्टर के प्रति भी बाजार का मूड बदल सकता है.
रुपए में गिरावट
ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में जबरदस्त बढ़ोतरी और तेल की ऊंची कीमतों की वजह से भारतीय रुपया दो महीने के निचले स्तर पर आ गयाख् इस करेंसी पर पहले से ही विदेशी पोर्टफोलियो से पैसे निकलने का दबाव था. रुपए पर लगातार दबाव के कारण एक्सपोर्टर्स अपनी मिलने वाली रकम की हेजिंग को लेकर सतर्क हैं, जबकि इम्पोर्टर्स की हेजिंग मजबूत बनी हुई है. इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डिमांड और सप्लाई का अंतर और बढ़ गया है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, FX एडवाइजरी फर्म IFA ग्लोबल सलाह देती है कि एक्सपोर्टर्स सावधानी से और सिर्फ हाथ में मौजूद ऑर्डर्स के लिए ही हेजिंग करें, जबकि इम्पोर्टर्स को डॉलररुपया पेयर में गिरावट का इस्तेमाल अपने एक्सपोज़र की हेजिंग के लिए करना चाहिए.



