कल्पना कीजिए एक बड़ा कमरा है. सभी लोग संभलकर बैठे हैं. कमरे के एक छोर पर सबसे ताकतवर व्यक्ति बैठा है. हर कोई बोलने से पहले अपने शब्द तौल रहा है. किसी को डर है कि कहीं कुछ गलत न कह दे. तभी कोई उस समस्या पर हल्कासा मजाक कर देता है, जिसके बारे में अब तक कोई खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा था. एक पल के लिए सन्नाटा होता है. फिर वह ताकतवर व्यक्ति मुस्कुराता है. बाकी लोग भी हंस पड़ते हैं. अचानक कमरे का माहौल बदल जाता है.

बाहर कुछ नहीं बदला. कुर्सियां वही हैं, पद वही हैं और समस्या भी वहीं है. फिर भी एक बंद दरवाजा खुल गया. जो सच आलोचना बनकर भीतर नहीं आ सकता था, वह हंसी का हाथ पकड़कर चुपचाप अंदर आ गया. हंसी कभीकभी सबसे ताकतवर इंसान को भी सुनने पर मजबूर कर देती है.
मुश्किल बात भी मुस्कुराकर कह देना
इंसान इस बात को सदियों से समझता आया है. राजदरबारों में विदूषक होते थे, गांवों में किस्से सुनाने वाले, रंगमंच पर व्यंग्य और परिवारों में अक्सर कोई ऐसा व्यक्ति होता था जो मुश्किल बात भी मुस्कुराकर कह देता था. उनका हास्य केवल मनोरंजन नहीं था. कई बार वह सच के लिए सुरक्षित रास्ता बन जाता था. सीधा आरोप सुनते ही हमारा मन अपनी ढाल उठा लेता है. लेकिन वही बात हंसी के साथ आए तो कभीकभी ढाल के नीचे से निकल जाती है, क्योंकि उस एक पल में वह व्यक्ति भी हंस रहा होता है जिस पर बात कही गई है.
हर कमरे का अपना एक मौसम
मन का यह बड़ा अजीब सच है कि जब हमें यह नहीं लगता कि कोई हम पर हमला कर रहा है, तभी हम खुद को देखने के लिए ज्यादा तैयार होते हैं. पत्रकारिता के इतने वर्षों में मैंने कमरों को पढ़ना सीखा है. हर कमरे का अपना एक मौसम होता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। कहीं असहमति खुलकर घूम सकती है. कहीं लोग हर वाक्य बोलने से पहले उसका वजन नापते हैं. इस बदलाव की घोषणा कोई नहीं करता, फिर भी उसे महसूस किया जा सकता है. हंसी भी सावधान होने लगती है. मजाक नीचे की ओर तो जाता है, लेकिन ऊपर की ओर जाना बंद कर देता है.
कौन किस पर हंस सकता है?
लोग अपने से कम ताकतवर व्यक्ति पर हंस लेते हैं, लेकिन ताकतवर के सामने गंभीर हो जाते हैं. तब हास्य हमें हास्य से कहीं बड़ी बात बताता है. किसी कमरे की सेहत शायद एक छोटेसे सवाल से समझी जा सकती है: वहां कौन किस पर हंस सकता है? लेकिन हंसी का एक अंधेरा पक्ष भी है. हास्य ताकत को आईना दिखा सकता है, लेकिन वह खुद भी ताकत बन सकता है. एक मजाक डर कम कर सकता है, लेकिन किसी ऐसे इंसान को अपमानित भी कर सकता है जो जवाब देने की स्थिति में नहीं है.
हमारी हंसी की कीमत कौन चुका रहा है?
पूरी कक्षा का एक बच्चे पर हंसना साहस नहीं है. किसी समूह का सबसे कमजोर व्यक्ति का मजाक उड़ाना समझदारी नहीं है. असली कसौटी यह है कि हंसी जा किस दिशा में रही है. जब हास्य किसी ताकतवर व्यक्ति को खुद को देखने में मदद करता है, तो वह आईना बन सकता है. जब वही हास्य किसी कमजोर को और छोटा महसूस कराए, तो वह हथियार बन जाता है. समझदारी केवल लोगों को हंसाना जानने में नहीं है. यह जानने में है कि हमारी हंसी की कीमत कौन चुका रहा है.
राजाओं, मालिकों या ताकतवर लोगों की बात क्यों करें?
अब बात और भीतर जाती है. हम केवल राजाओं, मालिकों या ताकतवर लोगों की बात क्यों करें? हम सबका कहीं न कहीं एक छोटासा राज्य है. बच्चे के सामने मातापिता के पास ताकत है. विद्यार्थी के सामने शिक्षक के पास. जूनियर के सामने सीनियर के पास. दोस्ती में भी कभी एक व्यक्ति की आवाज दूसरे से ज्यादा भारी हो सकती है. इसलिए असली सवाल यह नहीं कि ताकतवर लोग खुद पर हंस सकते हैं या नहीं.
असली सवाल है, क्या मैं खुद पर हंस सकता हूं? मेरा बच्चा मेरी किसी आदत पर मजाक करे तो क्या होता है? कोई छोटा साथी मेरी किसी बात और मेरे व्यवहार का फर्क मुस्कुराकर दिखा दे तो? कोई अपना मेरे गुस्से की नकल कर दे तो? क्या मैं खुद को पहचानकर हंस पाता हूं, या तुरंत सबको याद दिलाने लगता हूं कि यहां बड़ा कौन है?
शासक को सिर्फ प्रशंसा सुनाई देती
पुरानी समझ हमेशा सावधान करती रही है कि ताकत के आसपास केवल मीठी बातें कहने वाले लोग नहीं होने चाहिए. जिस शासक को सिर्फ प्रशंसा सुनाई देती है, वह धीरेधीरे सच्चाई से दूर होने लगता है. लेकिन यही खतरा हम सबके भीतर छोटे रूप में मौजूद है. हम उन लोगों के करीब रहना पसंद करते हैं जो हमें अच्छा महसूस कराते हैं और उनसे दूर होने लगते हैं जो हमारे बारे में बनी हमारी अपनी तस्वीर को हिला देते हैं. धीरेधीरे हम अपने चारों ओर एक छोटासा दरबार बना लेते हैं. सबको पता होता है कि कौनसी बात कही जा सकती है, किस बात पर मजाक नहीं करना है और कहां हमारी मुस्कान गायब हो जाएगी.
एक छोटा प्रयोग कीजिए. अगली बार कोई आप पर हल्कासा मजाक करे तो पहले मजाक को मत परखिए. अपने भीतर उठी पहली हलचल को देखिए. क्या कुछ कस गया? क्या तुरंत अपना बचाव करने का मन हुआ? क्या उससे भी तेज जवाब देने की इच्छा हुई? या आप हंसकर यह सोच पाए, क्या इसमें थोड़ासा सच भी छिपा है?
हमारे विरोधाभास और हमारी जरूरत
बच्चे यह बात आसानी से सिखा देते हैं. वे कई बार उन बातों पर हंस देते हैं, जिन्हें बड़े लोग वर्षों से छिपाने में लगे रहते हैं. वे हमारी अजीब आदतें, हमारे विरोधाभास और हमारी जरूरत से ज्यादा गंभीरता देख लेते हैं. उन्होंने अभी यह नहीं सीखा कि कौनसा सच बोलने से पहले अनुमति लेनी पड़ती है. शायद इसीलिए उनकी हंसी कभीकभी हमें असहज करती है. वह एक पल के लिए हमारा बनाया हुआ चेहरा हटा देती है.
शायद हास्य का सबसे ऊंचा रूप मजाक सुनाना नहीं, बल्कि खुद को बहुत ज्यादा गंभीरता से न लेना है. अहंकार हमेशा के लिए सिंहासन चाहता है. हंसी धीरे से याद दिलाती है कि कुर्सी हमेशा के लिए नहीं होती. अगर मेरे आसपास के लोगों ने मुझ पर हंसना बंद कर दिया है, तो क्या मेरा सम्मान बढ़ गया है, या उनका डर?



