सुबह उठते ही, नाश्ता करते हुए, खाना खाते हुए और रात में सोने से पहले… कुछ लोगों का दिन बिना रील्स को देखे नहीं बीत पाता. ये एक तरह से रील्स को देखने की लत है. पर क्या आप जानते हैं कि अगर रील्स देखने से एक हफ्ते का ब्रेक लिया जाए तो शरीर में क्या होता है? दरअसल, रील्स देखने वालों को कुछ सेकंड बाद नए कंटेंट की उम्मीद रहती है. इस वजह से इंटरेस्ट बढ़ता है और लोग घंटों शॉर्ट वीडियो को देखने में लगे रहते हैं.

एक्सपर्ट बताते हैं कि रील्स देखने में डोपामाइन का खेल होता है. जब भी हर स्वाइप पर लेटेस्ट, मजेदार और चौंकाने वाली वीडियो मिलती है तो माइंड का रिवॉर्ड सिस्टम एक्टिव हो जाता है.

ऐसे में बारबार रील्स देखने की लत या आदत मजबूत होने लगती है. लोगों को इसका नुकसान पता है फिर भी वे घंटों या काफी देर तक रील्स देखने में लगे रहते हैं. यहां हम आपको बताने जा रहे हैं कि रील्स देखने की आदत से ब्रेक लेने पर क्या होता है?

रूटीन पर पड़ता है अच्छा प्रभाव

डॉक्टर प्रीति सिंह का कहना है कि 7 दिनों के लिए रील्स और दूसरे शॉर्टफॉर्म कंटेंट से ब्रेक लेने से हमारी मानसिक सेहत, ध्यान देने की क्षमता और रोज की रूटीन पर काफी अच्छा प्रभाव पड़ सकता है. हालांकि हर किसी का अनुभव अलग हो सकता है, लेकिन लगातार स्क्रॉलिंग से दूर रहने से दिमाग को लगातार स्टिम्युलेशन के साइकिल से दूर जाने में मदद मिल सकती है.

पहले दो दिनों में क्या होता है?

पहले एक दो दिनों में ऐसा हो सकता है कि लोगों को फोन चेक करने की तलब हो सकती है, यह उन्हें बोरियत और बेचैनी हो सकती है. यह इसलिए होता है क्योंकि स्क्रॉलिंग एक ऑटोमैटिक आदत बन गई होती है खास कर उस समय जब इंतजार करना होता है, चिंता होती है या कुछ काम नहीं होता है. जब यह आदत एक बार छूटती है तो दिमाग माहौल में ढलने के लिए समय लेता है.

हफ्ते के बीच तक कई लोगों को बेहतर फोकस महसूस हो सकता है और उन्हें यह भी समझ आने लगता है कि वे बारबार फोन कब और क्यों देखते हैं. लगातार शॉर्ट वीडियो देखने की आदत कम होने से वे बिना तुरंत मनोरंजन की तलाश किए किसी काम पर ज्यादा समय तक ध्यान दे सकते हैं. बातचीत, काम या रोजमर्रा की दूसरी गतिविधियों के दौरान भी कुछ लोगों को वर्तमान पल पर ध्यान देना आसान लग सकता है.

बेहतर नींद आने लगती है

नींद में इसका सकारात्मक असर देखने को मिलता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। नींद भी अच्छी आ सकती है, खासकर अगर रील्स देर रात तक देखी जा रही हो. सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करने से सोने से पहले का रूटीन शांत हो सकता है और बस एक और वीडियो के लिए जागते रहने की आदत कम हो सकती है.

7 दिनों के अंत तक सबसे बड़ा बदलाव शरीर में नहीं, बल्कि आपकी आदतों में दिखाई दे सकता है. आपको यह समझ आने लग सकता है कि आप बारबार स्क्रॉल क्यों करते हैं और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कब और क्यों करना है, इस पर बेहतर नियंत्रण बना सकते हैं.

हालांकि 7 दिन का ब्रेक स्क्रीन के ज्यादा इस्तेमाल की समस्या को पूरी तरह खत्म नहीं करता. ये तरीके का मकसद टेक्नोलॉजी के साथ एक बेहतर और संतुलित रिश्ता बनाना है. कुछ समय फोन से दूर रहना, सोने से पहले रील्स न देखना और स्क्रॉलिंग की जगह एक्सरसाइज, पढ़ने या परिवारदोस्तों के साथ समय बिताने जैसी गतिविधियां करना इन अच्छी आदतों को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद कर सकता है.