हममें से बहुतों ने ऐसे दिन देखे हैं, जब बीमारी, चोट या गहरे दुख ने पूरी दुनिया एक कमरे तक सीमित कर दी. खिड़की से बाहर की आवाज़ें आती हैं. स्कूटर चलने की, पड़ोसी के पुकारने की, खेलते बच्चों के झगड़ने की. हम सुनते हैं, लेकिन उस जीवन से दूर होते हैं. अधिकांश लोगों के लिए दरवाज़ा फिर खुल जाता है. दक्षिण कश्मीर के बिजबेहड़ा में एक युवक के लिए वर्षों तक नहीं खुला. उसी खिड़की से उनके जीवन का काम शुरू हुआ.

उनका नाम है जावेद अहमद टाक. 1997 में वह इक्कीस साल के विज्ञान के छात्र थे. परिवार की आमदनी सीमित थी. 21 मार्च की रात वह अपने चचेरे भाई के घर थे. आधी रात को हथियारबंद आतंकवादी भाई को ले जाने घुसे. परिवार ने विरोध किया तो गोलियां चलीं. एक गोली जावेद को लगी. गुर्दे, जिगर, तिल्ली और रीढ़ को नुकसान पहुंचा.
सात महीने श्रीनगर के अस्पताल में रहे
जावेद अहम सात महीने श्रीनगर के अस्पताल में रहे. परिवार घर बंद करके उनके पास आ गया. रीढ़ का अंतिम ऑपरेशन सफल नहीं हुआ. डॉक्टरों ने बताया कि वह फिर चल नहीं पाएंगे. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। घर लौटे तो दो साल एक कमरे के बिस्तर पर बीते. न पैसे थे, न नौकरी, न आगे का रास्ता सूझता था.
खिड़की से सुनते गली के बच्चों की आवाज़
उन्होंने बताया है कि वह गहरी उदासी में थे. रोज़ खिड़की से गली के बच्चों की आवाज़ सुनते. जानते थे कि कई स्कूल नहीं जाते. एक दिन मां से कहा कि पड़ोस में जाकर ऐसे बच्चों को बुला लाएं. मां गईं और दो बच्चों को साथ ले आईं.
मां ने सात महीने की देखभाल
उस मां के पास भी थोड़ा ठहरना चाहिए. सात महीने अस्पताल में बेटे के साथ रहीं. फिर उस कमरे में उनकी देखभाल की, जिससे वह निकल नहीं सकते थे. बेटे ने कहा तो पड़ोस के दरवाज़े खटखटाने निकल पड़ीं. आगे जो हुआ, उसकी शुरुआत उनके इन्हीं कदमों से हुई.
बिस्तर पर लेटे बच्चों को पढ़ाया
जावेद बिस्तर से दोनों बच्चों को पढ़ाने लगे. फिर और बच्चे आए. उनके अनुसार, साल के अंत तक लगभग नब्बे बच्चों को सुबह से रात तक लेटे हुए पढ़ाते थे. पढ़ाने से अपना दर्द सहने में मदद मिली. उन्होंने दूर से पढ़ाई करने वाले पाठ्यक्रमों में दाखिला लिया. कंप्यूटर और मानवाधिकार पढ़े. युवाओं के लिए छोटा कंप्यूटर केंद्र खोला. ह्यूमैनिटी वेलफेयर ऑर्गनाइज़ेशन नाम की संस्था बनाई. बाद में जम्मू विश्वविद्यालय से समाजकार्य में स्नातकोत्तर पढ़ाई पूरी की.
दिव्यांग लोगों के अधिकारों के लिए याचिका
सातआठ साल बाद व्हीलचेयर पर अपनी गलियों से आगे निकले तो देखा कि सड़कों पर दिव्यांग लोग लगभग दिखाई नहीं देते. वर्षों के संघर्ष में इतने लोग घायल हुए थे, लेकिन स्कूल, दफ्तर और इमारतें सीढ़ियां चढ़ने वालों के लिए बनी थीं. उन्होंने दिव्यांग लोगों के अधिकारों पर जनहित याचिका दायर की. इससे जम्मूकश्मीर में उनकी स्थिति का सर्वेक्षण हुआ और कानून लागू करने पर ज़ोर पड़ा. उनके प्रयास से अपने विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वारों पर रैंप बने. उन पर चढ़कर कक्षा तक पहुंचने वाले कई विद्यार्थी शायद उनका नाम नहीं जानते होंगे.
दृष्टिहीन बच्चों का स्कूल खोला
उन्होंने दिव्यांग लोगों से सबसे बड़ी ज़रूरत पूछी तो जवाब अक्सर शिक्षा था. कई दृष्टिहीन लोगों को ब्रेल लिपि सीखने का अवसर नहीं मिला था. 2000 के दशक के बीच उनकी संस्था ने बिजबेहड़ा में दृष्टिहीन बच्चों का छोटा स्कूल खोला. बाद में सुनने, चलने और समझनेसीखने में कठिनाई वाले बच्चे भी आए. यह ज़ैबा आपा इंस्टीट्यूट ऑफ इन्क्लूसिव एजुकेशन बना. यहां बिना फीस पढ़ाई, किताबें और ज़रूरी उपचार मिलते हैं. कोशिश रहती है कि बच्चे दूसरे स्कूलों में भी सबके साथ पढ़ सकें. वर्षों के दौरान यहां एक समय में सौ से अधिक बच्चे पढ़े हैं. इनमें कुछ आतंकवादियों के बच्चे भी हैं. एक आगंतुक ने इस पर सवाल किया तो जावेद ने पूछा, पिता के अपराध की सज़ा बच्चों को क्यों मिले?.
काम चलाना आसान नहीं रहा. कश्मीर में बारबार स्कूल बंद होने से पढ़ाई टूटती रही. जावेद लगातार दर्द सहते हैं. पैसों की कमी रहती है. 2021 में भी वह दूर रहने वाले बच्चों के लिए गाड़ी, व्हीलचेयर, फिजियोथेरेपी के उपकरण और भोजन के लिए मदद मांग रहे थे. उसी नवंबर पद्मश्री मिला तो कहा कि ज़िम्मेदारी बढ़ गई है. तब तक सौ से अधिक लोग उनके साथ काम कर रहे थे. संस्था हज़ारों लोगों को पढ़ाई और रोज़गार की ओर बढ़ने में मदद कर चुकी थी. उनकी बात सीधी है. दिव्यांग लोग समाज का हिस्सा बनें, उससे अलग न रहें.
आज स्कूल के बच्चे उन्हें सर कहते हैं
आज स्कूल के बच्चे उन्हें सर कहते हैं. कोई व्हीलचेयर पर आता है. कोई बोर्ड नहीं देख पाता. कोई घंटी नहीं सुन पाता. सबके लिए रास्ता उस कमरे से खुला था, जहां बिस्तर के पास दो बच्चे बैठे थे. क्योंकि एक मां गली में निकली थीं और उन्होंने दरवाज़े खटखटाए थे.
उन्हें देखिए. उन्हें जानिए. उनका धन्यवाद कीजिए.



