काशी में आज भी एक कहावत बहुत प्रचलित है….’काशी बसें तो क्या बसें, घर औरंगाबाद.‘ यह कहावत काशी के कुछ ब्राह्मणों के विरोध के स्वरूप अस्तित्व में आई थी. जब मुगल शहजादे दारा शिकोह संस्कृत सीखने के लिए पंडित रामनंदपति त्रिपाठी के पास पहुंचे, तो इसका विरोध शुरू हो गया. इस पर पंडित रामनंदपति ने कहा था, ‘ज्ञान की पिपासा लेकर ड्योढ़ी पर आए किसी भी व्यक्ति को शिक्षा का दान देना ही ब्राह्मणत्व है.’ बाद में दारा शिकोह के कहने पर ही पंडित रामनंदपति ने ‘विराट विवरणम्’ की रचना की.

पंडित रामनंदपति त्रिपाठी एक जमाने के दिग्गज कांग्रेसी नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी के पूर्वज थे. वह मुगल काल में देवरिया से काशी के औरंगाबाद इलाके में आकर बस गए थे. इस बात को करीब चार सौ साल बीत चुके हैं. औरंगाबाद स्थित त्रिपाठी निवास आज ‘द औरंगाबाद हाउस’ के नाम से जाना जाता है. यहां दारा शिकोह से लेकर महात्मा गांधी, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तक आ चुके हैं.

चार दशक तक कांग्रेस का गढ़

कमलापति त्रिपाठी के पौत्र और टीएमसी नेता राजेशपति त्रिपाठी बताते हैं कि त्रिपाठी परिवार का राजनीति और कांग्रेस से नाता यूं तो 1905 से जुड़ा है. उस साल कमलापति त्रिपाठी के बाबा पंडित नारायणपति त्रिपाठी को कांग्रेस के बनारस अधिवेशन की रिसेप्शन कमेटी का सदस्य बनाया गया था. यही वह साल था, जब पंडित कमलापति त्रिपाठी का जन्म हुआ था.

कमलापति त्रिपाठी के कार्यकाल में औरंगाबाद हाउस पावर सेंटर के रूप में उभरा. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। राजेशपति त्रिपाठी बताते हैं कि असहयोग आंदोलन के दौरान जब महात्मा गांधी काशी आए, तो कमलापति जी उनसे बहुत प्रभावित हुए. वह राजनीति में आना चाहते थे, लेकिन महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी. महामना के मना करने के बावजूद कमलापति जी असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए. यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत हुई.

पंडित नेहरू के साथ साइकिल पर बैठकर काशी विद्यापीठ स्थित कांग्रेस कार्यालय जाने की घटना हो या लाल बहादुर शास्त्री के साथ उनकी दोस्ती, इन तमाम घटनाओं का गवाह औरंगाबाद हाउस रहा है. कमलापति त्रिपाठी कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रहे. वह केंद्र सरकार में दो बार रेल मंत्री बने और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे. लेकिन इन पदों से इतर वह ऐसे नेता के रूप में उभरे, जिनका बनारस से उत्तर प्रदेश की राजनीति पर गहरा प्रभाव था.

राजेशपति त्रिपाठी बताते हैं कि करीब चार दशक तक औरंगाबाद हाउस राजनीति का प्रमुख केंद्र बना रहा. कांग्रेस के कई नीतिगत फैसले यहीं से लिए जाते थे. एक जमाने में उत्तर प्रदेश की राजनीति में सीबी गुप्ता और कमलापति त्रिपाठी के दो गुट हुआ करते थे. उस दौर में दोनों गुट 250250 सीटों का हिसाब तय करते थे. तब उत्तर प्रदेश विधानसभा में 525 सीटें थीं. औरंगाबाद हाउस से यूपी चुनाव की 250 सीटों पर फैसले होते थे.

इंदिरा गांधी की एक टिप्पणी पर कमलापति ने दे दिया था इस्तीफा

कमलापति त्रिपाठी के पौत्र राजेशपति त्रिपाठी बताते हैं कि 1980 में जनता पार्टी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई और इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में आ गईं. कमलापति त्रिपाठी को फिर से रेल मंत्री बनाया गया. एक बार कैबिनेट की बैठक में इंदिरा गांधी ने टिप्पणी की कि आपातकाल के दौरान रेल मंत्रालय का जो प्रदर्शन था, अब वैसा नहीं रह गया है. यह बात पंडित कमलापति त्रिपाठी को इस कदर चुभी कि उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया.

इंदिरा गांधी ने 22 दिनों तक उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया और लगातार उन्हें मनाने की कोशिश करती रहीं, लेकिन पंडित जी नहीं माने. बाद में इंदिरा गांधी ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी, जिसमें कहा था कि जिस सरकार की मुखिया वह खुद हैं, उसमें कमलापति त्रिपाठी न हों, यह उनकी कल्पना से भी परे है.

पंडित जी ने इसके जवाब में लिखा था कि वह मंत्री बने रहने के लिए राजनीति में नहीं आए हैं. राजेशपति बताते हैं कि यह चिट्ठी आज भी उनके पास सुरक्षित है. पंडित कमलापति त्रिपाठी ने अपनी बहू और तत्कालीन कांग्रेसी सांसद चंद्रा त्रिपाठी से कहा था कि यह चिट्ठी मीडिया में नहीं जानी चाहिए.

पहले ही कर दी थी भविष्यवाणी—’कांग्रेस को यूपी में बचा पाना मुश्किल है’

राजेशपति त्रिपाठी कहते हैं कि लखनऊ में कांग्रेस की नई अध्यक्ष आराधना मिश्रा मोना और पूर्व अध्यक्ष अजय राय के समर्थकों के बीच हुई हाथापाई ने पंडित जी की भविष्यवाणी को एक बार फिर सही साबित कर दिया है. राजेशपति के मुताबिक, आज कांग्रेस की जो दुर्दशा है, उसके लिए मौजूदा नेताओं की गलती नहीं है. यह सिलसिला 1987 के बाद से ही लगातार चलता रहा है.

पंडित कमलापति त्रिपाठी ने राजीव गांधी से कई बार कहा था कि मंत्रियों का कार्यकर्ताओं से दूर रहना पार्टी के लिए ठीक नहीं है. उन्होंने सुझाव दिया था कि सभी वरिष्ठ मंत्रियों को हटाकर क्षेत्र में भेजा जाए. उनका मानना था कि कांग्रेस जमीन खो रही है और दक्षिणपंथी पार्टियां मजबूत हो रही हैं.

उनका कहना था कि मंत्री और बड़े नेता दिल्ली में अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने में लगे हैं, जबकि क्षेत्र में कांग्रेस का संगठन लगातार कमजोर हो रहा है. राजीव गांधी ने उनकी बात नहीं सुनी और आज पार्टी की हालत किसी से छिपी नहीं है.

राजेशपति त्रिपाठी वर्ष 1989 का वह वाकया याद करते हैं, जब पंडित कमलापति त्रिपाठी ने कांग्रेस को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी. उस दिन बनारस, मिर्जापुर और चंदौली के इलाकों से कुछ कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता औरंगाबाद हाउस पहुंचे थे. वह जनता दल का दौर था. तब राजेशपति के पिता लोकपति त्रिपाठी जीवित थे. राजेशपति बताते हैं कि वह उस समय चंदौली से लोकसभा का चुनाव हार चुके थे, जबकि उनके पिता मझवां से विधानसभा का चुनाव हार गए थे.

उनकी माता चंद्रा त्रिपाठी बनारस की जिलाध्यक्ष थीं, लेकिन कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उनका निधन हो गया था. कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने लोकपति त्रिपाठी से कहा कि राजेशपति को बनारस जिले का कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया जाए. पास के कमरे में पंडित कमलापति त्रिपाठी बैठे हुए थे. उस समय उनकी सेहत ऐसी नहीं थी कि वह सक्रिय रूप से राजनीति कर सकें.

उन्होंने कार्यकर्ताओं को बुलाया और बनारसी अंदाज में कहा, ‘राजेशपति के छोड़अ, तू लोग लोकपति जी के जिलाध्यक्ष बनावा लोग, नाहीं त बनारस जिले में कांग्रेस खोजे ना मिली.’ कार्यकर्ताओं ने जवाब दिया कि पंडित जी, लोकपति त्रिपाठी तो प्रदेश अध्यक्ष के स्तर के नेता हैं. इस पर कमलापति जी ने कार्यकर्ताओं को डांटते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश को मोहसिना किदवई और नारायण दत्त तिवारी के लिए छोड़ दो. तुम लोग बनारस और चंदौली संभालो, नहीं तो कांग्रेस के कार्यकर्ता खोजने से भी नहीं मिलेंगे. पंडित कमलापति त्रिपाठी का स्पष्ट मानना था कि जब तक वरिष्ठ नेता कार्यकर्ताओं से मेलजोल नहीं रखेंगे, तब तक कांग्रेस का भला नहीं होने वाला.