Foreign Investment: दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में निवेश को लेकर एक बड़ा फेरबदल हो रहा है. लंबे समय से विदेशी निवेशकों का चहेता रहा ड्रैगन अब अपना आकर्षण खो रहा है. इसकी जगह भारत ने विदेशी निवेश के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है. खास तौर पर ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स यानी बिल्कुल नए सिरे से शुरू होने वाले कारोबार में विदेशी कंपनियां भारत पर जमकर पैसा लुटा रही हैं. बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के ताजा आंकड़े इस बात की पूरी तरह से पुष्टि करते हैं. इन आंकड़ों ने साबित कर दिया है कि विदेशी निवेश खींचने के मामले में भारत ने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी को काफी पीछे धकेल दिया है.

बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2021 से 2025 के दौरान भारत ने 351 अरब डॉलर का बड़ा ग्रीनफील्ड विदेशी निवेश हासिल किया. ये आंकड़ा अपने आप में बहुत खास है. अगर इस निवेश की तुलना चीन से की जाए तो भारत को मिलने वाला निवेश दोगुने से भी ज्यादा है. इस रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात सामने आई है. भारत के इस प्रदर्शन में पिछले पांच सालों के मुकाबले 61 फीसदी का शानदार उछाल देखा गया है. इससे पहले के पांच सालों में देश को ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स के लिए 222 अरब डॉलर का निवेश मिला था. ये तेज बढ़ोतरी दिखाती है कि वैश्विक मंच पर भारतीय बाजार को लेकर निवेशकों का भरोसा किस कदर मजबूत हुआ है.
ड्रैगन से विदेशी निवेशकों का मोहभंग
एक तरफ भारत का ग्राफ रिकॉर्ड ऊंचाई पर जा रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन के लिए खतरे की घंटी बज रही है. बीसीजी के डेटा पर नजर डालें तो पता चलता है कि नए वेंचर्स में चीन का विदेशी निवेश बुरी तरह प्रभावित हुआ है. इस मोर्चे पर चीन को 54 फीसदी की भारी गिरावट का सामना करना पड़ा है. साल 2021 से 2025 के बीच उसे सिर्फ 159 अरब डॉलर का निवेश मिला. ये गिरावट इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि एक समय ऐसा था जब विदेशी कंपनियां वहां अपनी फैक्ट्री लगाने के लिए कतार में खड़ी रहती थीं. साल 2006 से 2010 के बीच अपने चरम पर चीन ने 514 अरब डॉलर का एफडीआई हासिल किया था. अब ये आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि निवेशकों की प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं. विदेशी निवेशकों के मन में चीन को लेकर कई चिंताएं घर कर गई हैं, जिसके चलते पूंजी का बहाव भारत की तरफ मुड़ गया है.
सप्लाई चेन बदलने की नई वैश्विक रणनीति
आजकल पूरी दुनिया में भूराजनीतिक तनाव देखने को मिल रहा है. कोरोना महामारी के बाद से बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों ने अपनी रणनीतियों में बड़े बदलाव किए हैं. बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर निकोलस लैंग ने इस बदलाव की वजहों पर विस्तार से रोशनी डाली. उनके मुताबिक अब कंपनियां किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहतीं. पहले एक ऐसा दौर था जब कंपनियां सिर्फ एक ही सोर्स से अपना सारा सामान खरीदती थीं, जहां उन्हें सबसे सस्ता मजदूर मिलता था. लेकिन अब वे दो या तीन अलगअलग देशों से सोर्सिंग करने के मॉडल पर शिफ्ट हो रही हैं. इसी रणनीति को दुनिया भर में ‘चाइना प्लस वन’ के नाम से जाना जाता है. ऐसे में भारत के पास खुद को एक मजबूत विकल्प के तौर पर स्थापित करने का बड़ा मौका है. निकोलस लैंग का भी यही मानना है कि बदलते दौर में भारत एक अहम भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है.
पड़ोसी एशियाई देशों की भी चमकी किस्मत
निवेशकों का ये नया रुझान सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. चीन से निकलने वाली पूंजी दक्षिण पूर्व एशिया के कई अन्य बाजारों में भी अपनी जगह बना रही है. इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि विदेशी कंपनियां चीन से अपना निवेश निकालकर मलेशिया जैसे देशों में भी ले जा रही हैं. आंकड़ों के लिहाज से देखें तो मलेशिया में ग्रीनफील्ड एफडीआई 125 फीसदी की तेज रफ्तार से बढ़कर 140 अरब डॉलर हो गया. इसी तरह इंडोनेशिया में 34 फीसदी की बढ़त देखी गई, जिससे वहां 133 अरब डॉलर का निवेश आया. थाईलैंड का आंकड़ा भी किसी से कम नहीं रहा, जहां 97 फीसदी के उछाल के साथ 56 अरब डॉलर का निवेश पहुंचा. हालांकि इसी अवधि के दौरान कुछ देशों को नुकसान भी उठाना पड़ा. वियतनाम में 12 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, जबकि फिलीपींस का निवेश भी 24 फीसदी तक फिसल गया. फिर भी एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ये देश लंबी अवधि में ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति से फायदे में ही रहेंगे.
भारत के लिए आगे का रोडमैप
देश में विदेशी निवेश का आना अर्थव्यवस्था के लिए एक संजीवनी की तरह है, लेकिन इस रफ्तार को बरकरार रखना सबसे बड़ी चुनौती है. निकोलस लैंग का साफ कहना है कि भारत को अगर ग्लोबल स्केल पर अपना मैन्युफैक्चरिंग का दायरा बढ़ाना है तो उसे कुछ बुनियादी बातों पर लगातार फोकस करना होगा. सिर्फ निवेश आने से काम नहीं चलेगा. भारत को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को और तेज करना होगा. इसके साथ ही लागत के मामले में विदेशी कंपनियों को बेहतर विकल्प देने होंगे ताकि उनका मुनाफा बना रहे.
स्किल डेवलपमेंट यानी कुशल कार्यबल तैयार करना इस कड़ी का सबसे अहम हिस्सा है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अगर देश में ऐसे लोग नहीं होंगे जो भारी मशीनों की असेंबली, आधुनिक पेंटिंग तकनीक या फिर मेकाट्रॉनिक्स जैसी आधुनिक चीजों को आसानी से संभाल सकें, तो विदेशी कंपनियों को स्थानीय स्तर पर काम करने में हमेशा दिक्कत आएगी. इसके अलावा निकोलस लैंग ने देश के भीतर मांग पैदा करने पर भी जोर दिया. भारत का अपना घरेलू बाजार काफी बड़ा है. अगर इस बाजार में उत्पादों की अच्छी मांग रहती है तो कंपनियों के लिए यहां पैसा लगाना बहुत फायदे का सौदा साबित होगा.



