अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच जब से जंग छिड़ी तभी से आपने होर्मुज स्ट्रेट खुलने, बंद होने की खबरें पढ़ी, सुनी और देखी होंगी. एक बार फिर से होर्मुज से आवाजाही सामान्य होने की खबरें आ रही है. राष्ट्रपति ट्रंप उसे खोलने पर राजी हुए हैं, इन सभी खबरों के बीच में आपने क्रूड ऑयल के दाम में भी तगड़ी उछाल और उसे औंधे मुंह गिरते हुए भी देखा होगा. होर्मुज तेल के लिए जरूरी है खासतौर पर भारत के लिए ये कोई छिपी बात नहीं है. दुनिया के कुल तेल कारोबार का करीब 20% हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है, इसलिए यहां जरा सी भी हलचल सीधे कीमतों और आपूर्ति पर असर डालती है. भारत की बात करें तो देश अपनी जरूरत का लगभग 8890% कच्चा तेल आयात करता है और इसमें से करीब 40% हिस्सा होर्मुज के रास्ते ही आता है. लेकिन क्या कभी सोचा है कि सऊदी अरब, UAE, इराक या कुवैत के तेल कुओं से निकला कच्चा तेल हजारों किलोमीटर का सफर तय करके आखिर आपकी गाड़ी की टंकी तक कैसे पहुंचता है? आइए इस खबर में इस पूरे सफर को स्टेप बाय स्टेप समझते हैं.

तेल के कुएं से शुरू होती है कहानी

सफर की शुरुआत सऊदी अरब, UAE, इराक और कुवैत जैसे खाड़ी देशों के तेल कुओं से होती है, जहां जमीन के अंदर से कच्चा तेल निकाला जाता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। यहां से निकलने के बाद इसे पाइपलाइनों के जरिए तटीय इलाकों की ओर भेजा जाता है.

एक्सपोर्ट टर्मिनल पर होती है तैयारी

पाइपलाइन के जरिए तेल एक्सपोर्ट टर्मिनल तक पहुंचता है, जहां इसे बड़े स्टोरेज टैंकों में जमा किया जाता है. यहीं से इसे जहाजों में लोड करने की प्रक्रिया शुरू होती है, ताकि इसे समुद्री रास्ते से दूसरे देशों तक भेजा जा सके.

  1. ऑयल टैंकर में भरा जाता है लाखों बैरल तेल एक्सपोर्ट टर्मिनल से कच्चा तेल विशाल ऑयल टैंकरों में भरा जाता है, जो एक बार में लाखों बैरल तेल ले जाने की क्षमता रखते हैं. ये टैंकर ही अगले कई दिनों तक इस कीमती माल को समुद्र के रास्ते ढोने का जिम्मा उठाते हैं.
  2. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है सबसे अहम पड़ाव फारस की खाड़ी से निकलने के लिए हर जहाज को इसी संकरी जलसंधि से गुजरना पड़ता है, जो ईरान और ओमान के बीच स्थित है. यही वजह है कि यहां किसी भी तरह की बाधा सीधे वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को हिला देती है.
  3. अरब सागर पार कर भारत की ओर बढ़ते हैं टैंकर होर्मुज से निकलने के बाद टैंकर ओमान की खाड़ी होते हुए अरब सागर में प्रवेश करते हैं. यहां से ये भारत के तटीय बंदरगाहों की ओर अपना सफर तय करते हैं, जिसमें आमतौर पर कई दिन लग जाते हैं.
  4. भारतीय बंदरगाहों पर उतरता है कच्चा तेल टैंकर जामनगर, मुंद्रा, मुंबई जैसे प्रमुख भारतीय बंदरगाहों पर लंगर डालते हैं, जहां कच्चे तेल को अनलोड किया जाता है. इन बंदरगाहों के पास ही ज्यादातर बड़ी रिफाइनरियां भी मौजूद होती हैं, जिससे प्रोसेसिंग में आसानी होती है.
  5. रिफाइनरी में होता है असली बदलाव बंदरगाह से कच्चा तेल पाइपलाइन के जरिए रिफाइनरी तक पहुंचाया जाता है, जहां इसे रिफाइन कर पेट्रोल, डीजल, LPG जैसे अलगअलग उत्पादों में बदला जाता है. यह पूरी प्रक्रिया अत्यधिक तापमान और दबाव वाली जटिल तकनीक से होती है.
  6. पाइपलाइन, रेल और टैंकरों से होती है आगे की सप्लाई रिफाइनरी से तैयार पेट्रोलडीजल को पाइपलाइन, रेलवे टैंक वैगन और सड़क टैंकरों के जरिए देशभर के डिपो तक भेजा जाता है. यहां से इसे अलगअलग शहरों और कस्बों के पेट्रोल पंपों तक पहुंचाया जाता है.
  7. आखिरकार पहुंचता है पेट्रोल पंप तक डिपो से टैंकर लोकल पेट्रोल पंपों पर ईंधन की सप्लाई करते हैं, जहां इसे भूमिगत टैंकों में स्टोर किया जाता है. यहीं से यह तेल आम उपभोक्ताओं को बेचा जाता है.
  8. और अंत में भरती है आपकी गाड़ी की टंकी पेट्रोल पंप से निकलकर यह तेल आखिरकार आपकी गाड़ी की टंकी में पहुंचता है. इस तरह खाड़ी के रेगिस्तान से निकला कच्चा तेल हजारों किलोमीटर, कई देशों और कई प्रक्रियाओं से गुजरकर आपके वाहन तक पहुंचता है.

कीमतों पर क्यों पड़ता है इतना असर

इस पूरी सप्लाई चेन में होर्मुज सबसे संवेदनशील कड़ी है, क्योंकि यहां से गुजरे बिना खाड़ी का ज्यादातर तेल बाहर नहीं जा सकता. यही वजह है कि यहां तनाव बढ़ते ही कच्चे तेल की कीमतों में उतारचढ़ाव शुरू हो जाता है, और आपूर्ति सामान्य होते ही राहत मिलती है.

भारत के लिए क्यों अहम है यह रूट

भारत अपनी करीब 40% तेल जरूरत होर्मुज के रास्ते ही पूरी करता है, इसलिए यहां की स्थिति सीधे घरेलू पेट्रोलडीजल कीमतों से जुड़ी होती है. हालांकि हाल के वर्षों में भारतीय रिफाइनरियों ने आयात स्रोतों में विविधता लाकर इस निर्भरता को कुछ हद तक कम करने की कोशिश की है.