भारतीय शेयर बाजार को लेकर बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है. नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की लेटेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की साइक्लिकल रिकवरी पर कई बड़े खतरे मंडरा रहे हैं. कच्चे तेल की सप्लाई में अचानक आने वाला शॉक, कम होता घरेलू स्टिमुलस, घटता एआई निवेश आने वाले समय में कॉरपोरेट जगत की कमर तोड़ सकता है. अगर आप शेयर बाजार में पैसा लगाते हैं तो ये रिपोर्ट आपके लिए किसी बड़े अलर्ट से कम नहीं है.

इकॉनमी पर मंडराता नया खतरा

रिपोर्ट के अनुसार, तेल सप्लाई शॉक का सबसे बुरा असर वित्तीय वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही से कंपनियों की बैलेंस शीट पर दिखने लगेगा. ठीक ऐसा ही ट्रेंड 2022 के युद्ध के दौरान देखने को मिला था, जब स्मॉलमिड कैप कंपनियों के मुनाफे में भारी गिरावट दर्ज की गई थी. Q1FY27 में जिन कंपनियों को इन्वेंट्री से फायदा मिला था, वो मुनाफे का दौर Q2FY27 से खत्म होने की आशंका है. यानी कंपनियों की कमाई घटेगी, जिसका असर उनके शेयरों की कीमतों पर भी पड़ेगा.

AI सेक्टर का बूम हो रहा धीमा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जो बूम दुनिया भर के बाजारों को रफ्तार दे रहा था, वो अब धीमा पड़ता नजर आ रहा है. नुवामा का कहना है कि एआई से जुड़े खर्चों की ग्रोथ कम हो रही है. अगर ये ट्रेंड जारी रहा, तो वित्त वर्ष 2027 की दूसरी छमाही से निर्यात के साथसाथ मेटल की कीमतों पर पड़ने वाला पॉजिटिव असर भी कमजोर हो जाएगा. बड़ी टेक कंपनियों के सामने चिप की बढ़ती कीमतें, चीन से मिल रही कड़ी टक्कर, कमजोर कैश फ्लो जैसी बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं. इन वजहों से टेक कंपनियों को निवेश के लिए उधारी का सहारा लेना पड़ रहा है.

डॉटकॉम बबल जैसी आहट

रिपोर्ट में एक बेहद डराने वाला संकेत भी छिपा है. हाल ही में हार्डवेयर टेक्नोलॉजी स्टॉक्स में तेज उछाल के बाद जो ठहराव आया है, उसे एक क्लासिक लेटसाइकिल संकेत माना जा रहा है. ये हालात साल 2000 के डॉटकॉम बबल फूटने से पहले के वक्त की याद दिलाते हैं. उस दौर में भी कैपिटल एक्सपेंडिचर क्रैश हो गया था, जिसने पूरे बाजार को हिलाकर रख दिया था. ये स्थिति मौजूदा निवेशकों के लिए सतर्क होने का बड़ा इशारा है.

बाजार पर बढ़ता विदेशी दबाव

ग्लोबल मार्केट के हालात भी भारत के लिए चिंता बढ़ा रहे हैं. अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रवैये के कारण अमेरिका, यूरोप, यूके, जापान में बॉन्ड यील्ड तेजी से बढ़ी है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। नुवामा के मुताबिक, महंगाई के हिसाब से एडजस्ट करने के बाद भी ये यील्ड काफी ज्यादा है. ये केवल केंद्रीय बैंकों की सख्त नीतियों का नतीजा नहीं है, बल्कि ग्लोबल स्तर पर अमेरिकी डॉलर के रीसायकल होने के तरीके में आए बदलाव का भी असर है.

अगर इन हालातों पर काबू नहीं पाया गया, तो रिस्क एसेट्स की वैल्यूएशन के साथ डिमांड पर भी भारी चोट पड़ेगी. पिछले दो सालों में भारतीय इक्विटी मार्केट का प्रदर्शन ऊपर से भले ही सपाट दिखे, लेकिन अंदर एक अलग ही कहानी चल रही है. सेफ माने जाने वाले लार्जकैप स्टॉक्स पिछड़ रहे हैं, जबकि स्मॉलमिड कैप्स हावी हैं. डिफेंसिव सेक्टर भी साइक्लिकल सेक्टर से पीछे चल रहे हैं.

Disclaimer: ये आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है और इसे किसी भी तरह से इंवेस्टमेंट सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए. TV9 भारतवर्ष अपने पाठकों और दर्शकों को पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है.