सरकार 100 अहम इम्पोर्टेड सामानों के लिए एक व्यापक कस्टम्स गाइडबुक तैयार कर रही है. इसका मकसद ‘फेसलेस कस्टम्स सिस्टम’ को स्टैंडर्ड बनाना है ताकि विवाद और क्लीयरेंस में लगने वाले समय को कम किया जा सके. साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जा सके कि बिजनेस भारत के हालिया फ्री ट्रेड एग्रीमेंट नेटवर्क के तहत टैरिफ का फायदा आसानी से उठा सकें. सरकार का यह कदम ‘फेसलेस कस्टम्स सिस्टम’ में सुधार के अगले चरण का हिस्सा है. इस सिस्टम को फिजिकल इंटरैक्शन खत्म करने, ट्रांसपेरेंसी बढ़ाने और टेक्नोलॉजी पर बेस्ड क्लीयरेंस सिस्टम बनाने के लिए शुरू किया गया था.

प्रस्तावित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर में फेसलेस कस्टम्स के लिए प्रोडक्ट और ओरिजिन के हिसाब से असेसमेंट गाइडलाइंस तय की जाएंगी. इससे हर ‘बिल ऑफ एंट्री’ पर पूछे जाने वाले सवालों की संख्या घटकर तीन रह जाएगी और किसी भी देरी के लिए असेसमेंट अधिकारियों को जवाबदेह बनाया जाएगा, ताकि कस्टम्स विभागों के फैसलों में ज्यादा यूनिफॉर्मेटी आ सके. सरकार को उम्मीद है कि SOPबेस्ड तरीके से ट्रांजैक्शन की कॉस्ट कम होगी, ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस’ बेहतर होगी और यह पक्का होगा कि भारत के ट्रेड एग्रीमेंट से इंडस्ट्री को ठोस फायदा मिले.

सरकार तेजी से कर रही है काम

सरकार पिछले चार महीनों से उन रुकावटों को दूर करने पर काम कर रही है जिनकी वजह से FTA के फायदों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता था. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अधिकारियों ने बताया कि नई SOPs से नेशनल असेसमेंट सेंटर्स को एक कॉमन रेफरेंस मिलेगा, जिससे अलगअलग तरह के तौरतरीकों को कम करने और बेवजह के विवादों से बचने में मदद मिलेगी.

एक सीनियर अधिकारी ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि इसका मकसद यह पक्का करना है कि असेसमेंट की प्रक्रिया अनुमान के मुताबिक, तेज और एक जैसी हो, चाहे बिल ऑफ एंट्री को कोई भी पोर्ट या कस्टम्स यूनिट हैंडल कर रही हो. अधिकारी ने आगे कहा कि शुरुआत में विभाग 100 आइटम के साथ काम शुरू करेगा और जैसेजैसे सिस्टम बेहतर होगा, इसमें और भी प्रोडक्ट जोड़े जाएंगे.

अब डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिस्टम्स को डेटा एक्सेस बेहतर करने, MIS सिस्टम को मजबूत करने और पेंडेंसी की निगरानी को ज्यादा असरदार बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. शिकायत निवारण के लिए एक इंटीग्रेटिड ढांचा बनाने की भी योजना है, जिसके तहत कस्टम जोन से उम्मीद की जाती है कि वे खास शिकायत सेल बनाएं, रेगुलर रिपोर्ट सौंपें और समयसमय पर समीक्षा करें. एक अन्य अधिकारी ने कहा कि सुधार का एजेंडा सिर्फ तेजी से क्लीयरेंस के बारे में नहीं है, बल्कि कस्टम के फैसलों को एक जैसा और कानूनी रूप से मजबूत बनाने के बारे में भी है.

क्यों अहम हैं SOP स्ट्रक्चर

SOP स्ट्रक्चर इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत ने हाल ही में बड़े व्यापार समझौते किए हैं, जिनमें भारतUK मुक्त व्यापार समझौता भी शामिल है. इन समझौतों के तहत तय टैरिफ छूट का लाभ उठाने के लिए कंपनियों के लिए कस्टम नियमों का असरदार ढंग से लागू होना जरूरी है. अलगअलग कस्टम लोकेशन पर नियमों की अलगअलग व्याख्या के कारण क्लासिफ़िकेशन, वैल्यूएशन और डॉक्यूमेंटेशन की जरूरतों को लेकर अनिश्चितता पैदा हुई है.

जिससे कंप्लायंस की कॉस्ट बढ़ी है और कार्गो क्लीयरेंस में देरी हुई है. इंडस्ट्री संगठनों ने कस्टम अधिकारियों की ओर से बारबार सवाल पूछे जाने, असेसमेंट को अंतिम रूप देने में देरी, अतिरिक्त डॉक्यूमेंटेशन की ज़रूरत और वैल्यूएशन के तरीकों को लेकर अनिश्चितता जैसी चुनौतियों की ओर इशारा किया है.

इंपोर्टर्स ने अलगअलग बंदरगाहों पर एक जैसे प्रोडक्ट के लिए अलगअलग असेसमेंट को लेकर बारबार चिंता जताई है, खासकर उन सेक्टर में जहां जटिल टैरिफ क्लासिफ़िकेशन और ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’ की ज़रूरतें शामिल हैं. भारतUK व्यापार समझौते पर बातचीत के दौरान, दोनों पक्षों ने एक बेहतर ऑपरेशनल स्ट्रक्चर की जरूरत पर जोर दिया था ताकि यह पक्का किया जा सके कि ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’, डॉक्यूमेंटेशन और प्रेफरेंशियल टैरिफ दावों की प्रक्रिया कुशलतापूर्वक पूरी हो सके.