केंद्र सरकार अब समुद्र की गहराइयों में छिपे तेल और गैस के भंडार को बाहर निकालने के लिए सालदरसाल का पूरा रोडमैप तैयार कर रही है. इस स्कीम का नाम ‘समुद्र मंथन’ यानी नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम है. इसे पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत केंद्रीय क्षेत्र की योजना के रूप में मंजूरी दी गई है. योजना का मकसद समुद्र तल के नीचे छिपे करीब 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट यानी लगभग 60 करोड़ टन कच्चे तेल के बराबर ऊर्जा भंडार का पता लगाना है, ताकि भारत की इम्पोर्ट पर निर्भरता घटे और एनर्जी सिक्योरिटी मजबूत हो. योजना के पहले फेज के तहत वित्त वर्ष 203031 तक कुल 84,084 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. 31 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने इस योजना को मंजूरी दी थी. आइए इसके बारे में विस्तार से समझते हैं.

क्यों शुरू करनी पड़ी स्कीम?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का कंज्यूमर है और उसका सालाना इम्पोर्ट बिल करीब 144 अरब डॉलर यानी लगभग 13 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है. बीते एक दशक में कच्चे तेल पर इम्पोर्ट निर्भरता 77% से बढ़कर 88% हो चुकी है. वहीं, प्राकृतिक गैस की करीब आधी जरूरत भी इम्पोर्ट से पूरी होती है. भारत के पूर्वी और पश्चिमी ऑफशोर बेसिन, जो 3,000 मीटर तक की गहराई तक फैले हैं, में 5,600 MMTOE से ज्यादा हाइड्रोकार्बन क्षमता होने का अनुमान है, लेकिन डीपवाटर ड्रिलिंग बहुत महंगी और रिस्की प्रक्रिया है. एक कुएं की ड्रिलिंग पर ही 125150 मिलियन डॉलर तक खर्च आता है और एक्सप्लोरेशन ब्लॉक मिलने से लेकर कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू होने तक 5 से 10 साल लग सकते हैं. यही रिस्क अब तक प्राइवेट और सरकारी दोनों कंपनियों को गहरे समुद्र में उतरने से रोकता रहा है. इसी रिस्क को सरकार के साथ शेयर करने के मकसद से समुद्र मंथन योजना लाई गई है.

4 भागों में बटी है पूरी स्कीम

योजना को मुख्य रूप से चार हिस्सों में बांटा गया है और हर हिस्से के लिए अलग बजट तय किया गया है.

  1. पहला और सबसे बड़ा हिस्सा है सीस्मिक डेटा कलेक्शन, प्रोसेसिंग और इंटरप्रिटेशन, जिसके लिए 28,534 करोड़ रुपये रखे गए हैं. इसमें 2D सर्वे के लिए 12,000 करोड़ रुपये, 3D सर्वे के लिए 12,534 करोड़ रुपये और नेशनल डेटा रिपॉजिटरी के पुराने डेटा को AI टूल्स से दोबारा प्रोसेस करने के लिए 4,000 करोड़ रुपये शामिल हैं.
  2. दूसरा हिस्सा है ‘एक्सेलेरेटेड ऑफशोर एक्सप्लोरेशन’, जिसके लिए 43,200 करोड़ रुपये का प्रावधान है. इसके तहत डीपवाटर और अल्ट्राडीपवाटर इलाकों में करीब 60 कुओं की ड्रिलिंग की जाएगी. सरकार हर कुएं की ड्रिलिंग लागत का 50% तक या अधिकतम 675 करोड़ रुपये, जो भी कम हो, वित्तीय मदद के रूप में देगी. यह सुविधा सरकारी और प्राइवेट दोनों E&P कंपनियों के लिए खुली है.
  3. तीसरा हिस्सा है साझा ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर, जिसके लिए 10,000 करोड़ रुपये रखे गए हैं. खासतौर पर महानदी और कच्छ बेसिन जैसे इलाकों में प्रोडक्शन और निकासी की साझा सुविधाएं बनाई जाएंगी.
  4. चौथा हिस्सा है ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग एंड सर्विसेज जोन, जिसके लिए 2,000 करोड़ रुपये तय किए गए हैं. इसका इस्तेमाल घरेलू मैन्युफैक्चरिंग, रिपेयर, वेयरहाउसिंग और इंजीनियरिंग क्षमता बढ़ाने में होगा. इसके अलावा मॉनिटरिंग, डिजिटल काम, मूल्यांकन, ह्यूमन रिसोर्स और जागरूकता के लिए 350 करोड़ रुपये अलग रखे गए हैं.

इससे देश को क्या फायदा होगा?

अब बात करते हैं कि इस पूरी कवायद से क्या हासिल होने की उम्मीद है. सरकार का अनुमान है कि इससे 600 MMTOE से ज्यादा हाइड्रोकार्बन भंडार जुड़ जाएंगे. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इससे देश का कुल रिसोर्स बेस 1.6 अरब टन से बढ़कर 2.2 अरब टन ऑयल इक्विवेलेंट तक पहुंच सकता है. सालाना घरेलू उत्पादन को मौजूदा करीब 62 MMTOE से बढ़ाकर 80 MMTOE तक ले जाने का लक्ष्य है. यानी 1015 MMTOE की अतिरिक्त प्रोडक्शन क्षमता तैयार हो सकती है, जो पीक पर 20 MMTOE तक जा सकती है. इससे हर साल करीब 1 लाख करोड़ रुपये के कच्चे तेल इम्पोर्ट में कटौती हो सकती है और विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत होगी. साथ ही निवेश, रोजगार और मेक इन इंडिया के तहत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.

यह योजना अचानक नहीं आई है, बल्कि पिछले एक दशक में हुए कई रिफॉर्म की अगली कड़ी है. इनमें 99% ‘नोगो’ क्षेत्रों को खोलना, 2016 में हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंसिंग पॉलिसी और ओपन एक्रीएज लाइसेंसिंग प्रोग्राम लाना, प्रोडक्शन शेयरिंग की जगह रेवेन्यू शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट मॉडल अपनाना और 2025 में ऑयलफील्ड्स रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट संशोधन कानून पारित करना शामिल है. इन रिफॉर्म का असर भी दिख रहा है. OALP के तहत अब तक 172 ब्लॉक, यानी करीब 3.8 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र आवंटित किया जा चुका है. इनमें 4.3 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश की प्रतिबद्धता जताई गई है. वित्त वर्ष 202526 में करीब 674 कुओं की ड्रिलिंग, पांच नई खोज और सात खोजों का कमर्शियल इस्तेमाल शुरू हुआ. हाल ही में 25 जुलाई 2026 को महानदी बेसिन में पहले ‘अप्रेजल वेल’ MNDWN181HD की ड्रिलिंग भी शुरू हुई है. कुल मिलाकर, समुद्र मंथन योजना भारत की एनर्जी सिक्योरिटी और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है.