सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की विधानसभाओं को बिक्री या खरीद पर पहले से लागू टैक्स के आधार पर अतिरिक्त टैक्स, सरचार्ज या सेस लगाने का अधिकार बरकरार रखा है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सात जजों की संविधान पीठ ने कहा कि बिक्री कर पर अतिरिक्त लेवी लगाने की राज्यों की विधायी शक्ति को पहले के फैसले में मान्यता दी जा चुकी है और वह कानूनी स्थिति अब भी लागू है.

यह मामला करीब 27 साल पहले सात जजों की पीठ को भेजा गया था. विवाद ओडिशा सेल्स टैक्स एक्ट, 1947 की धारा 5A से जुड़ा था. इस प्रावधान के तहत कुछ कारोबारियों पर उनके सालाना टर्नओवर के आधार पर अतिरिक्त टैक्स लगाया गया था. जिन कारोबारियों का सालाना टर्नओवर 10 लाख रुपये से एक करोड़ रुपये के बीच था, उन पर 10 फीसदी और एक करोड़ रुपये से अधिक टर्नओवर वालों पर 15 फीसदी अतिरिक्त टैक्स का प्रावधान था.
पांच जजों की पीठ के फैसले का हवाला
याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया था कि क्या राज्य सरकार को इस तरह अतिरिक्त टैक्स लगाने का अधिकार है? उनका तर्क था कि यह लेवी बिक्री या खरीद पर टैक्स के बजाय कारोबारियों की आय पर टैक्स लगाने जैसी है और इस तरह संसद के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करती है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पांच जजों की पीठ के एस. कोडर बनाम केरल राज्य मामले का हवाला दिया. उस फैसले में अतिरिक्त बिक्री कर को वैध माना गया था.
‘विवादित कानूनी प्रावधान ही बदला जा चुका’
सात जजों की पीठ ने साफ किया कि बिक्री कर के आधार पर तय किया गया अतिरिक्त टैक्स भी बिक्री या खरीद पर टैक्स की प्रकृति का ही होता है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस कानूनी प्रावधान को लेकर विवाद था, वह बाद में बदला जा चुका है या उसकी जगह दूसरे कानून लागू हो चुके हैं. इसलिए सात जजों की पीठ के सामने भेजा गया सवाल अब व्यावहारिक महत्व नहीं रखता और अकादमिक प्रकृति का रह गया है.
इन सात जजों की पीठ ने सुनाया फैसला
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि 2017 में GST लागू होने के बाद इस विवाद का महत्व काफी हद तक समाप्त हो गया है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसके बावजूद अदालत ने राज्यों की विधायी शक्ति के संबंध में पहले से स्थापित कानूनी स्थिति को बरकरार रखा. इस फैसले में CJI जस्टिस सूर्यकांत के साथ जस्टिस केवी विश्वनाथन, एसवीएन भट्टी, जॉयमाल्या बागची, एनवी अंजारिया, अरुण पल्लि और वी. मोहना शामिल थे. जस्टिस विश्वनाथन ने सहमति वाला अलग फैसला भी लिखा.



