चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार का ऐलान हो गया है. इसे जर्मनी के पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल और अमेरिका के कार्ल डाइसेरोथ को दिया गया है. यह पुरस्कार लाइट गेटेड आयन चैनल्स और ऑप्टोजेनेटिक्स के लिए दिया गया है. आसान भाषा में समझें तो ऑप्टोजेनेटिक्स एक बायोलॉजिकल तकनीक है जो जीवित टिश्यू के अलगअलग सेल्स की सटीक इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी को मॉनिटर और कंट्रोल करने के लिए जेनेटिक इंजीनियरिंग और लाइट का इस्तेमाल करती है.

आइए आसान भाषा में समझते हैं कि क्या है ऑप्टोजेनेटिक्स, अब तक क्या दिक्कत थी और इसके आने के बाद इंसान के शरीर में क्याक्या बदलेगा?
क्या है तकनीक?
यह तकनीक रोशनी और जीन की मदद से कोशिकाओं को ऑन और ऑफ करने देती है. हमारा दिमाग अरबों न्यूरॉन से बना है. अब तक समस्या यह थी कि वैज्ञानिक इनमें से किसी एक खास किस्म की कोशिका को अलग से कंट्रोल नहीं कर पाते थे. दवा या बिजली का झटका पूरा हिस्से पर असर डालता था.
इसे उदाहरण के साथ ऐसे समझ सकते हैं कि एक बड़े शहर की सारी बत्तियां एक ही मेन स्विच से जुड़ी हों, तो आप पूरे शहर की बिजली ही चालू या बंद कर सकते हैं. ऑप्टोजेनेटिक्स ने हर बत्ती का अलग स्विच बना दिया. इससे सिर्फ चुनी हुई कोशिकाएं चालू या बंद होती हैं और बाकी दिमाग अपना काम करता रहता है.
न्यूरॉन. फोटो: pexels
कैसे काम करती है यह तकनीक?
पूरी प्रक्रिया को तीन आसान चरणों में समझा जा सकता है.
1. जीन पहुंचाना: वैज्ञानिक रोशनी पहचानने वाले एक प्रोटीन का जीन एक चुनी हुई कोशिकाओं में डालते हैं.
2. कोशिका बनती है “लाइटसेंसिटिव”: उस जीन से कोशिका के भीतर वह प्रोटीन बनने लगता है और कोशिका रोशनी के प्रति संवेदनशील हो जाती है.
3. रोशनी डालना: एक बेहद पतले फाइबर से तय रंग की रोशनी डाली जाती है. रोशनी पड़ते ही वह कोशिका संकेत भेजने लगती है, या दूसरे प्रोटीन के मामले में शांत हो जाती है.
कहानी शुरू हुई एक शैवाल से
इस खोज की जड़ें एक बेहद छोटे हरे शैवाल से जुड़ी हैं, जिसका नाम है क्लैमिडोमोनास. यह रोशनी की तरफ तैरता है, क्योंकि इसे अपना भोजन धूप से बनाना होता है. इसके पास रोशनी पहचानने वाली एक “आंख” जैसी छोटी संरचना होती है.
1990 के दशक की शुरुआत में हेगेमन ने यह जांचना शुरू किया कि यह शैवाल रोशनी पर कुछ मिलीसेकंड में कैसे प्रतिक्रिया देता है. इसके पीछे रोडोप्सिन फैमिली के प्रोटीन निकले. हमारी आंख में भी ऐसे ही प्रोटीन रोशनी पकड़ते हैं.
आगे चलकर हेगेमन और नागेल ने मिलकर पता लगाया कि इस शैवाल में एक प्रोटीन खुद ही कोशिका की झिल्ली में दरवाजा खोल देता है. रोशनी पड़ते ही दरवाजा खुलता है, आवेशित कण अंदर आते हैं और बिजली का संकेत पैदा हो जाता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसे चैनलरोडोप्सिन कहा गया. नोबेल समिति इसे नस कोशिकाओं के लिए एक मॉलिक्यूलर स्विच बताया है, यही दरवाज़ा आगे चलकर ऑप्टोजेनेटिक्स की नींव बना.
ब्रेन. फोटो: pexels
दिमाग के रहस्य खोलने में कितनी मदद?
ऑप्टोजेनेटिक्स से पहले वैज्ञानिक ज्यादातर दिमाग की गतिविधि को सिर्फ देख पाते थे. अब वे यह भी परख सकते हैं कि किसी खास कोशिका के चालू या बंद होने से क्या बदलता है. इस तकनीक से पता चला है कि कौनसे न्यूरॉन और रास्ते खाने, मेलजोल और आक्रामकता जैसे व्यवहार को चलाते हैं.
नोबेल समिति के मुताबिक यह तरीका दिखाता है कि जीवित दिमाग में तंत्रिका कोशिकाएं यादों, भावनाओं और व्यवहार को कैसे आकार देती हैं.
नोबेल समिति के अध्यक्ष पर स्वेनिंगसन ने कहा कि यह तकनीक दिमाग का नक्शा बनाने के ऐसे मौके देती है जिनका पहले सिर्फ सपना देखा जा सकता था. इसका इस्तेमाल सिर्फ दिमाग तक सीमित नहीं है. इससे दिमाग के बाहर तंत्रिका तंत्र और कोशिकाओं के काम का नक्शा बनाने में भी मदद मिल रही है.
यह तकनीक रोशनी और जीन की मदद से कोशिकाओं को ऑन और ऑफ करने देती है. फोटो: pexels
क्या इससे इलाज भी होगा?
यही सबसे बड़ी उम्मीद है. वैज्ञानिकों का मानना है कि आगे चलकर इस तकनीक के इलाज में भी उपयोग हो सकते हैं. जिन क्षेत्रों पर खास नज़र है.
- सुनने की क्षमता: शोधकर्ता उम्मीद करते हैं कि ऑप्टोजेनेटिक्स से कॉक्लियर इम्प्लांट बेहतर हो सकते हैं. मौजूदा इम्प्लांट बिजली से काम करते हैं, जबकि रोशनी से श्रवण तंत्रिका को ज्यादा सटीक तरीके से उत्तेजित किया जा सकता है.
- आंखों की रोशनी: दृष्टि बहाल करने और सुनने की थेरेपी में भी इसकी संभावनाएं तलाशी जा रही हैं.
- दिमागी बीमारियों की समझ: जब पता चलता है कि कौनसी कोशिकाओं का सर्किट गड़बड़ाने से कोई बीमारी होती है, तो इलाज की दिशा तय करना आसान हो जाता है.
BREAKING NEWS
The 2026 #NobelPrize in Physiology or Medicine has been awarded to Karl Deisseroth, Peter Hegemann and Georg Nagel for their discoveries concerning lightgated ion channels and optogenetics. https://t.co/pkDDEBWtkz— The Nobel Prize October 5, 2026
अभी क्या चुनौतियां हैं?
यह तकनीक अभी ज्यादातर प्रयोगशालाओं और जानवरों पर होने वाले अध्ययनों में इस्तेमाल होती है. इंसानों में इस्तेमाल के लिए दो बड़ी मुश्किलें हैं. पहली, कोशिकाओं में सुरक्षित तरीके से जीन पहुंचाना. दूसरी, दिमाग के गहरे हिस्सों तक रोशनी पहुंचाना. इसलिए इसे अभी रोजमर्रा के इलाज की तकनीक नहीं माना जा सकता.



