लाइफ इंश्योरेंस को लंबे समय की वित्तीय सुरक्षा का सबसे भरोसेमंद साधन माना जाता है, लेकिन भारत में बड़ी संख्या में लोग मैच्योरिटी से पहले ही अपनी पॉलिसी बंद कर रहे हैं. भारतीय रिजर्व बैंक की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट 2026 के आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 202526 में बीमा कंपनियों ने मैच्योरिटी पर जितना भुगतान किया, उससे अधिक रकम पॉलिसी सरेंडर और निकासी के रूप में चुकाई. विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे गलत तरीके से पॉलिसियां बेचना , ग्राहकों की अवास्तविक उम्मीदें और बदलती आर्थिक परिस्थितियां बड़ी वजह हैं.

RBI रिपोर्ट ने क्या बताया?
RBI की रिपोर्ट के मुताबिक, FY26 में लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के कुल भुगतान में 38.3% हिस्सा पॉलिसी सरेंडर और निकासी का रहा, जबकि मैच्योरिटी बेनेफिट का हिस्सा 36.9% रहा. केंद्रीय बैंक ने कहा कि लगातार ऊंची सरेंडर दर इस बात का संकेत हो सकती है कि ग्राहक पॉलिसी से संतुष्ट नहीं हैं, उन्हें सही जानकारी नहीं दी गई या फिर वे दूसरे निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं.
हर दो में से एक ग्राहक पांच साल से पहले छोड़ देता है पॉलिसी
इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं. इनके अनुसार, देश में सिर्फ करीब आधी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियां ही पांच साल तक जारी रह पाती हैं. यानी हर दो में से एक पॉलिसीधारक पांचवीं वर्षगांठ से पहले ही प्रीमियम भरना बंद कर देता है या पॉलिसी सरेंडर कर देता है.
FY25 में प्रमुख निजी बीमा कंपनियों के 61वें महीने के पर्सिस्टेंसी रेशियो में ICICI Prudential Life 58.8% के साथ सबसे आगे रही. इसके बाद Bandhan Life , Canara HSBC Life , Tata AIA Life और Kotak Mahindra Life का स्थान रहा.
आखिर लोग बीच में ही क्यों छोड़ देते हैं पॉलिसी?
विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे कई वजहें हैं. कई ग्राहक पॉलिसी खरीदते समय इसे निवेश का साधन समझ लेते हैं. उन्हें यह उम्मीद होती है कि तीनचार साल में अच्छा रिटर्न मिलेगा. लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तो वे पॉलिसी सरेंडर कर देते हैं.
Insurance Samadhan की COO शिल्पा अरोड़ा का कहना है कि लाइफ इंश्योरेंस को अक्सर सुरक्षा के बजाय निवेश उत्पाद की तरह बेच दिया जाता है. ग्राहकों को रिटर्न पर ज्यादा जोर देकर समझाया जाता है, जबकि यह नहीं बताया जाता कि यह लंबी अवधि की वित्तीय सुरक्षा के लिए बनाया गया उत्पाद है.
वहीं 1 Finance की पार्टनर मंजू ढाके का मानना है कि ऊंची सरेंडर दर ग्राहकों के भरोसे में कमी का संकेत है. उनके अनुसार, जब बड़ी संख्या में लोग शुरुआती वर्षों में ही पॉलिसी छोड़ देते हैं, तो इसका मतलब है कि उन्हें वही उत्पाद नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी.
बीमा कंपनियां क्या कहती हैं?
बीमा कंपनियां मानती हैं कि हर मामले में मिससेलिंग जिम्मेदार नहीं होती. Kotak Life Insurance के चीफ डिस्ट्रीब्यूशन ऑफिसर पीयूष त्रिवेदी के मुताबिक, कई बार लोगों की आर्थिक प्राथमिकताएं बदल जाती हैं. मेडिकल इमरजेंसी, नौकरी छूटना, बच्चों की पढ़ाई, अचानक पैसों की जरूरत या दूसरे निवेश विकल्पों की ओर रुख करने जैसी परिस्थितियों में भी लोग पॉलिसी बंद कर देते हैं.
IndiaFirst Life Insurance के COO अत्री चक्रवर्ती का भी कहना है कि जीवन के अलगअलग चरणों में वित्तीय जरूरतें बदलती रहती हैं. रिटायरमेंट, कर्ज चुकाना या पारिवारिक जिम्मेदारियों में बदलाव भी पॉलिसी सरेंडर की वजह बन सकते हैं.
पॉलिसी सरेंडर से कंपनियों को भी होता है नुकसान
विशेषज्ञों का कहना है कि जल्दी पॉलिसी बंद होने से सिर्फ ग्राहक ही नुकसान नहीं उठाते, बल्कि बीमा कंपनियों पर भी इसका असर पड़ता है. नए नियमों के बाद कंपनियों को एजेंटों और बैंकों को ज्यादा कमीशन देना पड़ता है. अगर ग्राहक कुछ वर्षों में ही पॉलिसी छोड़ देता है, तो कंपनियों को सरेंडर वैल्यू भी चुकानी पड़ती है, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है.
पॉलिसी खरीदने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि लाइफ इंश्योरेंस खरीदते समय केवल रिटर्न देखकर फैसला न करें. सबसे पहले यह समझें कि यह निवेश से ज्यादा वित्तीय सुरक्षा का साधन है. पॉलिसी का उद्देश्य, प्रीमियम अवधि, सरेंडर नियम और संभावित नुकसान अच्छी तरह समझें. साथ ही बीमा कंपनी का पर्सिस्टेंसी रेशियो भी जरूर देखें, क्योंकि यह बताता है कि उसके कितने ग्राहक लंबे समय तक पॉलिसी जारी रखते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि बीमा उद्योग को सिर्फ नई पॉलिसियां बेचने पर नहीं, बल्कि ग्राहकों को उनकी जरूरत के मुताबिक सही सलाह देने और पूरी जानकारी उपलब्ध कराने पर जोर देना होगा. वहीं ग्राहकों को भी बिना पूरी शर्तें समझे किसी भी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी में निवेश करने से बचना चाहिए.



