इतिहास एक दिलचस्प मोड़ पर था. अंग्रेजों के खिलाफ़ 1857 की आजादी की पहली लड़ाई की अगुवाई का दबाव उस आख़िरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफ़र पर था, जिसके उज़बेक पुरखे बाबर ने 331 साल पहले भारत पर हमला कर दिल्ली की सल्तनत पर कब्जा किया था. इस वक्त तक मुगल सल्तनत दिल्ली के लालकिले तक सिमट चुकी थी. बादशाह को अंग्रेजों से मिल रही पेंशन का सहारा था. लेकिन अभी दरबार का आडंबर बदस्तूर था. जफ़र की आमद के पेशतर बांदी की आवाज गूंजतीहोशियार, अदब कायदा निगाहदार. फिर चोबदार इसे दोहराते. अमीरवज़ीरदरबारी सबकी गर्दनेंनिगाहें झुकी और बंधे हाथ पुराने दौर की शान की याद दिलाते. बादशाह के गद्दी पर विराजते ही चोबदार पुकारता ,”जिल्लेइलाही बरामद कर्द मुजरा अदब से.” एक के बाद एक सहमे अमीर दरबारी तय जगह खड़े होते और तीन बार कोर्निश बजाते. लेकिन 11 मई 1857 की तारीख ने उसी बादशाह की जिंदगी में तूफान ला दिया था.

ब्रिटिशइंडियन आर्मी के बागी हिंदुस्तानी सिपाही उसे घेरे हुए थे. उन्होंने हिंदुस्तान पर काबिज ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़ाई शुरू कर दी थी. बेबस बादशाह उनसे कह रहा था कि हमारी जिंदगी का सूरज ढल रहा है. न हमारे पास फौज है, न ही हथियार और न खजाना, हम किस तरह तुम्हारी मदद कर सकते हैं?” बागी कुछ सुनने को तैयार नहीं थे, “हम लगान से आपका खजाना भर देंगे. हमे बस आपकी सरपरस्ती चाहिए.” बूढ़े बादशाह ने मजबूरी में बगावत की कमान संभाली थी. उसे धुंधली सी उम्मीद मुग़ल हुकूमत की वापसी की भी रही होगी. आजादी की तारीख 15 अगस्त नज़दीक है. इस मौके पर पढ़िए अंग्रेजों के खिलाफ़ 1857 की वो पहली लड़ाई, जिसकी अगुवाई बाद सल्तनत का दिया हमेशा के लिए बुझ गया.
वो तारीख जिसने जफ़र के दरबार में तूफान ला दिया
बेशक हुकूमत के नाम पर कुछ नहीं बचा था. लेकिन एक लाख महीने की पेंशन की बदौलत 80 साल के बूढ़े बादशाह बहादुर शाह जफ़र के दिन अपने अमीरवजीर और दरबारियों द्वारा दी जा रही इज्ज़त के बीच आमतौर पर चैन से गुजर रहे थे. अंग्रेजों की निगाह में बादशाह का भले कुछ खास मर्तबा न बचा रहा हो लेकिन लाल किले के भीतर की रियाया अभी भी बादशाह की शान में किसी गुस्ताख़ी के बारे में नहीं सोच सकती थी. पर 11 मई 1857 को लाल किले के भीतर का मंजर बिलकुल बदला हुआ था.
अंग्रेजों के खिलाफ़ 1857 की पहली लड़ाई लड़ी गई. फोटो: AI Generated
मेरठ से अंग्रेजी सेना के बागी हिंदुस्तानी सिपाहियों के हुजूम किले की हिफाज़त में तैनात सिपाहियों को किनारे झटकते हुए भीतर दाखिल हो चुके थे. उन्हें उम्मीद थी कि वहां उन्हें हाथों हाथ लिया जाएगा और बादशाह की मदद से आगे की लड़ाई उनके लिए आसान हो जाएगी.
आंखों में अंगारहाथों में हथियार
इन बागी सिपाहियों को बूढ़े बादशाह की खस्ता माली हालत का अहसास नहीं था. उन्हें यह तो पता था कि जफ़र के पास फौजी ताकत नहीं बची है. लेकिन रहनेखाने और जंग के खर्चों का इंतजाम बादशाह की तरफ़ से हो जाने पर वे इस कमी को अपनी तादाद और ताकत के भरोसे पूरा कर सकेंगे, इसका उन्हें भरोसा था. मेरठ छावनी से निकले इन बागी सिपाहियों की आंखों में बदले की आग थी. हाथों में हथियार थे, लेकिन भूख से आंतें कुलबुला रही थीं.
किले में दाखिल होते ही इन सिपाहियों की पहली मांग खाने की थी. वहां इनकार के जवाब से नाराज एक बागी सिपाही ने शाही ख़्वाजासरा महबूब अली खान के पेट में पिस्तौल सटा कर कहा हमें अनाज दो. महबूब ने कहा जब हमारे पास कुछ है ही नहीं, तो हम कहां से दें? हकीम अहसनुल्लाह खां ने दोहराया,” बादशाह सलामत बता चुके हैं कि हमारे पास पैसा नहीं है. वे खुद ही एक भिखारी की जिंदगी गुजार रहे हैं. हमारे पास अस्तबल के घोड़ों के लिए सिर्फ एक महीने का अनाज है. चाहे तो उसे ले लो. लेकिन उससे शायद तुम सबका एक ही दिन का काम चल सके?
बहादुर शाह जफर. फोटो: Getty Images
सदमे में बादशाह
बागी सिपाही वापसी के लिए तैयार नहीं थे. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। उलटे तादाद बढ़ती गई . दीवानएखास के सामने इकट्ठा इन सिपाहियों के शोर के बीच बादशाह जफर बाहर आने को मजबूर हुए. बागी सिपाहियों ने उनसे कहा कि वे अंग्रेजों को मारकर उनकी पनाह में आए हैं. आपकी सरपरस्ती चाहिए. एक ओर गुजारिश थी तो साथ ही धमकी भी कि अगर आप हमारा साथ नहीं देंगे तो उस सूरत में अपने लिए जो कर सकते हैं वो करेंगे.
बादशाह पहली बार ऐसे बेखौफ लहजे से बाबास्ता थे. सदमे में बादशाह ने कहा , “एक बूढ़े आदमी के साथ इतनी बेइज्जती का सलूक क्यों किया जा रहा है? हमारी जिंदगी का सूरज ढल रहा है. ये हमारे आखिरी दिन हैं. न हमारे पास फौज है, न ही हथियार और न खजाना, हम किस तरह तुम्हारी मदद कर सकते हैं?” लेकिन बागी कुछ सुनने को तैयार नहीं थे. उन्होंने भरोसा दिया कि वे लगान से उनका खजाना भर देंगे.
मजबूरी में सरपरस्ती की रजामंदी
बूढ़े और हर तरह से कमजोर बादशाह को ये बागी सिपाही नेतृत्व सौंपने की जिद क्यों किए हुए थे? असलियत में उन्होंने अंग्रेजों की बड़ी ताकत के ख़िलाफ़ मोर्चा तो खोल दिया था लेकिन लड़ाई जारी रखने के लिए हिम्मत के साथ नेतृत्व और संसाधनों की जरूरत भी थी. बादशाह द्वारा अपनी गुरबत बयान करने के बाद भी इन सिपाहियों को यकीन था कि बादशाह के आगे रहने पर जनता जुड़ेगी और उससे रुपयेपैसे और हथियारों का मिलना आसान हो जाएगा. बेशक तब तक मुगल साम्राज्य का सूरज डूब चुका था लेकिन उसकी शाही मुहर अभी भी पूरे उत्तर भारत में वैधता की सबसे बड़ा प्रतीक थी. राजपाट खोने के बाद भी जनता के मन में बादशाह के प्रति सहानुभूति और सम्मान बरकरार था. जफर के बार बार के इनकार और अपनी मजबूरी बयान करने के बाद भी बागी अपनी जिद पर अड़े हुए थे. बादशाह फिर भी नहीं मानते तो ये सिपाही उनके साथ आगे क्या सलूक करते, इसका उनके तेवरों से सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता था.
आखिरकार बादशाह राजी हुए. यक़ीनन ये रजामंदी मजबूरी की थी. मुमकिन है कि बागियों के दबाव के साथ ही मुगल ताकत की वापसी के आखिरी अवसर की क्षीण आशा का योगदान भी इसमें शामिल रहा हो. इसके बाद उन्होंने फ़रमान जारी किए या उनसे जारी कराए गए. हिंदूमुस्लिम एकता की उन्होंने अपील की. देशी रियासतों को खत लिखे और विद्रोह को वैधता देने का प्रयास किया.
पता था खुद डूबेंगे, मुझे भी डुबोएंगे
शुरुआती कामयाबी के बाद अंग्रेजों की ताकत के आगे बागी कमजोर साबित हुए.1857 की असफल क्रांति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही रहा कि जिस व्यक्ति को क्रांति का प्रतीक बना दिया गया, वह उसकी सोच की उपज नहीं थी. मजबूरी में बादशाह उससे जुड़े. बेशक उनके नाम पर लड़ाई लड़ी जा रही थी, लेकिन इससे जुड़े फैसले उनके नहीं थे. बागी सेना के अफसर से सिपाही तक न उन्हें सम्मान दे रहे थे और न उनकी सुन रहे थे. उनके नाम पर जारी फरमान कुछ अगर उनकी मर्जी के थे तो तमाम उनके नाम पर या तो जारी कर दिए गए या फिर जारी करा लिए गए. नतीजों का बादशाह को इल्म पहले से था.
अंग्रेजी सेना की जीत के बाद जान की हिफाज़त की बादशाह को फिक्र थी. लाल किले से निकल वे दरगाह निजामुद्दीन पहुंचे. निराशा में डूबे हुए. दाढ़ी धूल से अटी थी. गुलाम हसन चिश्ती को बादशाह के दरगाह में पहुंचने की खबर मिली. देखा कि बादशाह कब्र के सिरहाने दरवाजे से टिके बैठे हैं. चिश्ती ने खैरियत पूछी. मायूसी बीच भी वे हंसे और कहा, “मैंने पहले ही कहा था कि ये अभागे बागी सिपाही मनमानी कर रहे हैं. खुद भी डूबेंगे. मुझे भी डुबोएंगे. आखिर में वही हुआ. सब भाग निकले. मेरे बापदादों ने इससे भी मुश्किल वक्त देखा लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ी. पर मुझे आने वाला कल दिख रहा है. कोई शक नहीं कि गद्दी पर आखिरी मुग़ल हूं. दिया बुझने को है. सैकड़ों बरस हमारा शासन चला. अब दूसरों का समय है. कोई बात नहीं. हमने भी तो दूसरों को मिटा अपना घर बसाया था.”
जहां दरबार, वहां कैदी
लालकिले में जिस तख्त के सामने कभी हिंदुस्तान के नवाब और राजा सिर झुकाते थे, उसी किले में बादशाह जफ़र अब कैदी थे. 27 जनवरी 1858 को फौजी अदालत के सामने गद्दारी के जुर्म में मुकदमा चलाए जाने के लिए उन्हें पेश किया गया. मुकदमे की कार्यवाही हिन्दुस्तानी जुबान में तय थी लेकिन इस फौजी अदालत के जूनियर रैंक के पांचों सदस्य ऑफिसर इस जुबान को न पढ़ और न ही समझ सकते थे.
अदालत की सदारत करने वाला करने ब्रिगेडियर शॉवर बेशक हिंदुस्तानी जुबान से वाकिफ़ था लेकिन मुकदमे की कार्यवाही की शुरुआत में अदालत में वह सिर्फ इतना कहने आया कि उसे आगरा जाकर वहां की कमान संभालने का आदेश मिला है. ज़फर के खिलाफ इल्ज़ाम पढ़े गए. उनसे सवाल किया गया कि क्या वे इन्हें कुबूल करते हैं? जफ़र लगभग इनसे अनजान थे. बहुत जल्द यह अंदाज हो गया कि अदालती कार्यवाही से वे बिल्कुल बेखबर हैं.
काफी देर लगी उन्हें समझनेसमझाने में कि वे कहें कि उन्हें इल्ज़ाम कुबूल नहीं हैं. अगले दिनों में उनके ख़िलाफ़ सबूतों के कागज पेश किए जाते रहे. उनके वकील गुलाम अब्बास को कागजात दिखाए जाते. वकील बादशाह को अपने दस्तखतों से इनकार और कागजों से अनजान होने का इशारा करते लेकिन जफ़र आमतौर पर उदासीन रहते. फैसला तय था और वही हुआ. देश निकाला की सजा हुई. आखिरी वक्त रंगून की तन्हाई में “कितना बदनसीब है जफ़र, दफ़न के लिये दो गज जमीं न मिली कूएयार में , लिखते हुए वे दुनिया से रुखसत हुए. 1857 की असफल क्रांति की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उसकी अगुवाई उस बूढ़े बादशाह पर थोपी गई, जिसके पास न अपनी कोई ताकत थी और न फैसला लेने की आजादी. ग़ालिब 1857 के दौरान दिल्ली में थे. अपनी फ़ारसी कृति “दास्तानबू ” में उन्होंने लिखा है कि दिल्ली में असली ताकत बागी सिपाहियों के हाथ में थी और शाही दरबार पूरी तरह उनके कब्जे में था.



