सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 26 दिनों बाद अनशन खत्म कर दिया है. इसके साथ ही उनकी भूख हड़ताल भी खत्म हो गई है. वांगचुक ने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के साथ मुलाकात के बाद अपना अनशन तोड़ दिया है. वो कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शन के समर्थन में 28 जून से अनशन पर थे. सोनल वांगचुक गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती थे. गुरुवार देररात केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने उन्हें जूस पिलाकर अनशन खत्म कराया.

लम्बी भूख हड़ताल के मामले में आमतौर पर जूस या नारियल पानी के जरिए अनशन खत्म कराया जाता है. सामान्य भाेजन नहीं दिया जाता, इसके पीछे भी विज्ञान है.
भूख हड़ताल के बाद नारियल पानी या जूस ही क्यों?
शरीर को काम करने के लिए एनर्जी की जरूरत होती है, लेकिन जब शरीर को लम्बे समय तक भोजन नहीं मिला तो वह एनर्जी ग्लूकोज की जगह बॉडी फैट और मांसपेशियों को तोड़ने लगता है. नतीजा, ब्लडशुगर तेजी से गिरता है. इसके साथ ही शरीर में सोडियम, पोटैशियम और फॉस्फेट जैसे जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स की भी कमी हो जाती है, जिससे दिमाग तक सही मात्रा में एनर्जी पहुंचना मुश्किल हो जाता है.
सोनम वांगचुक से मिलकर भूख हड़ताल खत्म कराने पहुंचे जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह. फोटो: X
डॉक्टर लंबे अनशन के बाद सीधे ठोस भोजन लेने से मना करते हैं. ऐसा करने पर शरीर में “रीफीडिंग सिंड्रोम” नाम की गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है. क्लीवलैंड क्लीनिक की रिपोर्ट कहती है कि जब कोई पोषक तत्वों की कमी से जूझने वाला इंसान इंसान दोबारा भोजन शुरू करता है तो रीफीडिंग सिंड्रोम हो सकता है. अगर भोजन बहुत जल्दी शुरू हो जाए तो इससे गंभीर दिक्कतें पैदा हो सकती हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पोषक तत्वों की कमी होने पर हमारे शरीर में परिवर्तन आ जाते हैं. जब हम दोबारा भोजन शुरू करते हैं, तो शरीर को उसी स्थिति में वापस आना पड़ता है, लेकिन हो सकता है कि शरीर तत्काल उस स्थिति में पहुंचने के लिए तैयार न हो.
नारियल का पानी. फोटो: Pexels
जूस, नारियल पानी और ORS जैसे लिक्विड्स में नेचुरल शुगर, जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स और पानी की मात्रा संतुलित रूप में होती है. ये शरीर को धीरेधीरे और सुरक्षित तरीके से एनर्जी देना शुरू करते हैं, जिससे ब्लड शुगर लेवल अचानक नहीं बल्कि धीरेधीरे ऊपर आता है.
नारियल पानी में पोटैशियम भरपूर मात्रा में होता है, जो इलेक्ट्रोलाइट संतुलन करने में मदद करता है, जबकि फलों के जूस से शरीर को तुरंत ग्लूकोज मिल जाता है, जिसे पचाना आसान होता है. यही वजह है कि अस्पतालों में भी अनशन तोड़ने से पहले अक्सर ड्रिप के जरिए पहले जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स दिए जाते हैं, और उसके बाद ही लिक्विड डाइट की शुरुआत होती है.
ऐसे मामलों में कार्डियक अरेस्ट का खतरा बढ़ता है. फोटो: Pexels
किस बात का खतरा?
Webmd की रिपोर्ट कहती है, अगर रीफीडिंग सिंड्रोम हो जाता है, तो यह आपके शरीर के अलगअलग अंगों पर असर डाल सकता है. इसके असर जानलेवा हो सकते हैं. कुछ खास लक्षण दिख सकते हैं. जैसे ब्लड प्रेशर में बदलाव, कार्डियक अरेस्ट, डायरिया, शरीर में पानी जमा होना, हार्ट बीट में बदलाव, लकवे का दौरा और सांस से जुड़ी समस्या.
विशेषज्ञों का मानना है कि रीफीडिंग सिंड्रोम को होने से रोकना ही सबसे असरदार तरीका है. शरीर में इलेक्ट्रोलाइट के लेवल पर नजर रखना जरूरी है. अगर कोई गड़बड़ी होती है तो डॉक्टर रीफीडिंग सिंड्रोम को रोकने के लिए न्यूट्रिएंट्स के फॉर्मूले में बदलाव करेंगे.



