भारतीय वायुसेना दिवस पर जब देश अपनी एयर पावर और बदलती युद्ध तकनीक की बात कर रहा है, तब एक महिला पायलट का अनुभव इस बदलाव की दूसरी तस्वीर दिखाता है. पूर्व वायुसेना पायलट जया तारे के लिए यह बदलाव सिर्फ कॉकपिट में बढ़ती तकनीक का नहीं, बल्कि महिलाओं के लिए बदलती भूमिका का भी है. कल तक जहां महिला पायलट को अपनी क्षमता साबित करनी पड़ती थी, अब अगली चुनौती कॉकपिट से आगे बढ़कर नेतृत्व करने की है.

एक वक्त था जब भारतीय वायुसेना में महिला पायलट के लिए सिर्फ अच्छा पायलट होना काफी नहीं था. उसे यह भी साबित करना पड़ता था कि वह उस भूमिका के लिए बनी है. पूर्व भारतीय वायुसेना पायलट जया तारे के लिए ये पर्सनल एक्सपीरियंस का हिस्सा है वो उस दौर से गुजरी हैं जब महिला पायलट के सामने चुनौती सिर्फ आसमान में विमान संभालने की नहीं, बल्कि जमीन पर बनी धारणाओं को बदलने की भी थी.

जया तारे कहती हैं, जब मैंने एयर फोर्स में शुरुआत की थी, तब एक महिला पायलट के लिए सिर्फ अच्छा पायलट होना ही काफी नहीं था आपको कई बार यह भी साबित करना पड़ता था कि आप उस रोल के लिए बनी हैं.

महिलाएं रिप्रेजेंट नहीं अब लीड कर रहींः जया तारे

लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है. महिलाओं ने फाइटर कॉकपिट में अपनी जगह बनाई है और अब सवाल यह नहीं रह गया कि महिलाएं क्या कर सकती हैं? जया के मुताबिक, अगली चुनौती प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि नेतृत्व की है. महिलाएं रिप्रेजेंट नहीं अब लीड कर रही हैं.

जया कहती हैं, महिला पायलट को सिर्फ एयरक्राफ्ट कमांडर नहीं, बल्कि फॉर्मेशन कमांडर, मिशन कमांडर, इंस्ट्रक्टर और स्ट्रैटेजिक लीडर के रूप में देखना होगा.

यही भारतीय वायुसेना में महिलाओं की बदलती भूमिका की सबसे बड़ी तस्वीर है. आज भावना कंठ और अवनी चतुर्वेदी जैसी महिला पायलट फाइटर स्ट्रीम में अपनी पहचान बना चुकी हैं.

अगला सवाल है कि कॉकपिट में जगह बनाने के बाद कमांड और रणनीतिक नेतृत्व में महिलाओं की हिस्सेदारी कितनी बढ़ती है.

जया की सबसे बड़ी उम्मीद भी इसी बदलाव से जुड़ी है. वह कहती हैं, मेरी सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि आने वाली जनरेशन की लड़कियों को अपने आप को एक्सप्लेन करने में उतना समय नहीं लगाना पड़ेगा. उन्हें अपनी कैपेबिलिटी से पहचाना जाएगा.

कॉकपिट भी बदला, युद्ध भी

जया जिस दौर में उड़ान भरती थीं और आज की सैन्य एविएशन के बीच सिर्फ महिला पायलटों की भूमिका ही नहीं बदली है. कॉकपिट और युद्ध का पूरा तरीका बदल रहा है. जया अपने फ्लाइंग डेज को याद करते हुए बताती हैं कि तब पायलट को कॉकपिट में बैठकर अपने आसपास के पूरे माहौल को खुद पढ़ना पड़ता था— एयरक्राफ्ट, मौसम, इंस्ट्रूमेंट्स, रेडियो कम्युनिकेशन और अपनी ट्रेनिंग पर भरोसा करना पड़ता था.

आज सेंसर, डेटा लिंक्स, सैटेलाइट, एआई और अनमैन्ड सिस्टम ने युद्धक्षेत्र को कहीं ज्यादा कनेक्टेड बना दिया है. फाइटर जेट अब अकेले नहीं लड़ रहा. उसके साथ ड्रोन, सेंसर, डेटा और एआई आधारित सिस्टम भी भविष्य के मिशन का हिस्सा बन रहे हैं. लेकिन तकनीक के इस दौर में भी जया इंसान की भूमिका को कम नहीं मानतीं. उनका कहना है, टेक्नोलॉजी तभी ताकत बनती है जब उसे इस्तेमाल करने वाला इंसान ट्रेंड हो.

उनके मुताबिक भविष्य की लड़ाई सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि किस देश के पास कितना एडवांस्ड एयरक्राफ्ट है. असली बढ़त उस वायुसेना को मिलेगी जो नई तकनीक को जल्दी समझे, उसे ऑपरेशनल बनाए और अपने लोगों को उसके साथ एडाप्ट करना सिखाए.

टेक्नोलॉजी बदलती रहेगी. ह्यूमन कैपेबिलिटी रिमेन्स द स्ट्रैटेजिक एडवांटेज. जया की यह बात आने वाली एयर वॉरफेयर की पूरी तस्वीर को एक लाइन में सामने रख देती है.

फिजिकल फिटनेस से आगे है मानसिक मजबूती

फाइटर पायलट की बात आते ही अक्सर फिजिकल फिटनेस का जिक्र होता है. लेकिन वर्षों की फ्लाइंग और मिलिट्री लाइफ ने जया को एक और सबक दिया मुश्किल हालात में सिर्फ शरीर की ताकत काम नहीं आती. वो कहती हैं, पायलट बनने के लिए फिजिकल फिटनेस जरूरी है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। आपको अपने एयरक्राफ्ट और मिशन की डिमांड्स के लिए फिजिकली फिट होना ही होगा. लेकिन वर्षों की फ्लाइंग और मिलिट्री लाइफ ने मुझे यह सिखाया कि मुश्किल परिस्थितियों में आपको संभालने वाली चीज सिर्फ फिजिकल स्ट्रेंथ नहीं, मेंटल क्लैरिटी होती है.

कॉकपिट में हर चीज पायलट के कंट्रोल में नहीं होती. मौसम अचानक बदल सकता है, सिस्टम अलग तरह से बिहेव कर सकता है और कई बार पूरी जानकारी भी उपलब्ध नहीं होती. लेकिन फैसला लेना होता है वह भी बहुत कम समय में.

परिस्थितियां फेवर में न हों, तभी असली टेस्टः जया

जया के लिए मानसिक मजबूती का मतलब डर या दबाव का बिल्कुल न होना नहीं है. वो कहती हैं, प्रेशर के बावजूद शांत रहना, सिचुएशन को क्विकली असेस करना और सही डिसीजन लेने की क्षमता है.

यही बात भविष्य की एयर वॉरफेयर में और महत्वपूर्ण होने वाली है. जब कॉकपिट में पायलट के सामने पहले से कहीं ज्यादा डेटा होगा, जब एआई सुझाव देगा और जब ड्रोन और अनमैन्ड सिस्टम साथ उड़ेंगे, तब मशीन से ज्यादा जरूरी होगा कि इंसान उस जानकारी को कितनी तेजी से समझता और सही फैसला लेता है.

जया कहती हैं, मैंने मिलिट्री में सीखा कि लीडरशिप और फ्लाइंग—दोनों का असली टेस्ट तब होता है जब परिस्थितियां आपके फेवर में न हों.

शायद इसलिए बदलती भारतीय वायुसेना की कहानी सिर्फ फाइटर जेट से एआई तक पहुंचने की कहानी नहीं है. यह उस इंसान की कहानी भी है जो बदलती तकनीक के बीच फैसला लेगा, नेतृत्व करेगा और जरूरत पड़ने पर मशीन से अलग अपना निर्णय लेने की क्षमता रखेगा. और महिला पायलटों के लिए सफर अब सिर्फ कॉकपिट तक पहुंचने का नहीं है. अब उड़ान कमांड तक पहुंचने की है.