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Image Credit: अमेरिका में 1 करोड़ की कमाई, फिर भी बचते हैं सिर्फ 1 लाख! Image credit: instagram/@desidadinamerica
अमेरिका में नौकरी और लाखों रुपये की सैलरी का सपना भारत में रहने वाले बहुत से युवाओं को आज भी अपनी तरफ खींचता है. डॉलर में कमाई सुनते ही अक्सर लोगों को लगता है कि वहां रहने वाला व्यक्ति भारत के मुकाबले कई गुना ज्यादा पैसे बचाता होगा. लेकिन असल तस्वीर हमेशा इतनी सीधी नहीं होती. अमेरिका में ज्यादा कमाई के साथ घर, टैक्स, इंश्योरेंस और रोजमर्रा के खर्च भी तेजी से बढ़ जाते हैं.
अमेरिका में पिछले करीब 15 साल से रह रहे डिजिटल कंटेंट क्रिएटर नितिन मल्होत्रा ने इसी फर्क को समझाने के लिए अपना मंथली बजट सोशल मीडिया पर शेयर किया है. उन्होंने बताया कि अमेरिका में उनकी करीब 8,000 डॉलर की मंथली इनकम होती है, लेकिन तमाम खर्चों के बाद सेविंग के लिए बहुत ज्यादा रकम नहीं बचती. वहीं, भारत में जब उनकी सालाना सैलरी करीब 25 लाख रुपये थी, तब कम खर्च के कारण वह हर महीने अपनी कमाई का करीब आधा हिस्सा बचा लेते थे. उनके इस अनुभव ने सोशल मीडिया पर लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर ज्यादा सैलरी और ज्यादा सेविंग में कितना फर्क होता है.
8 हजार डॉलर कमाने के बाद भी कितना बचता है?
इंस्टाग्राम अकाउंट ‘desidadinamerica’ पर शेयर किए गए करीब 1 मिनट 17 सेकंड के वीडियो में नितिन ने अमेरिका में अपने खर्चों का पूरा हिसाब बताया. उन्होंने समझाया कि हर महीने 8,000 डॉलर की कमाई होने के बाद सबसे पहले कई बड़े खर्च सामने खड़े हो जाते हैं. नितिन के मुताबिक, करीब 2,500 डॉलर होम लोन की किस्त में चले जाते हैं. इसके बाद लगभग 1,500 डॉलर टैक्स में कटते हैं. दो कारों के इंश्योरेंस पर करीब 500 डॉलर खर्च होते हैं. फैमिली हेल्थ इंश्योरेंस का खर्च भी करीब 500 डॉलर है.
इन जरूरी खर्चों के बाद घर चलाने का खर्च शुरू होता है. नितिन बताते हैं कि खाने-पीने पर हर महीने करीब 1,000 से 1,200 डॉलर खर्च हो जाते हैं. इसके अलावा 500 से 800 डॉलर अलग-अलग एक्स्ट्रा खर्चों में चले जाते हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इन सबको जोड़ने के बाद उनके पास सेविंग के लिए करीब 1,000 से 1,200 डॉलर ही बचते हैं.
भारत में 25 लाख की सैलरी पर ज्यादा बचत
नितिन ने अमेरिका के खर्चों की तुलना अपने भारत में बिताए दिनों से भी की. उनके मुताबिक, भारत में उनकी सालाना कमाई करीब 25 लाख रुपये थी. इसका मतलब महीने की कमाई लगभग 2 से 2.5 लाख रुपये के आसपास बैठती थी. उस समय उनके घर का किराया करीब 30 हजार रुपये महीना था. इसके अलावा रोजमर्रा के खर्च भी अमेरिका की तुलना में काफी कम थे. नितिन का कहना है कि इन सभी खर्चों को निकालने के बाद भी वह हर महीने करीब 1 से 1.25 लाख रुपये तक आसानी से बचा लेते थे. मतलब कमाई अमेरिका के मुकाबले कई गुना कम थी, लेकिन सेविंग का हिस्सा ज्यादा था. यही बात उनके पूरे वीडियो का सबसे बड़ा पॉइंट है. वह लोगों को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि सिर्फ सैलरी देखकर किसी देश में आपकी आर्थिक स्थिति का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.
पत्नी की जॉब से बढ़ेगा खर्च भी
नितिन ने अपने वीडियो में एक और अहम बात बताई. फिलहाल उनकी पत्नी जॉब नहीं कर रही हैं. इसका एक फायदा यह है कि परिवार को बच्चों के डे-केयर पर एक्स्ट्रा पैसा खर्च नहीं करना पड़ रहा. उनका कहना है कि अगर पत्नी भी नौकरी शुरू करती हैं, तो दूसरी तरफ इनकम बढ़ेगी, लेकिन बच्चों की देखभाल और डे-केयर जैसे खर्च भी बढ़ सकते हैं. अमेरिका में छोटे बच्चों की देखभाल का खर्च कई परिवारों के लिए बड़ा मंथली एक्सपेंस बन जाता है. इसका मतलब अमेरिका में सिर्फ एक व्यक्ति की सैलरी को देखकर परिवार की सेविंग का अंदाजा लगाना सही नहीं होगा. परिवार में कितने लोग कमाते हैं, बच्चे कितने हैं, घर अपना है या किराए का और हेल्थ इंश्योरेंस जैसी सुविधाओं पर कितना खर्च होता है, इन सबका बड़ा असर पड़ता है.
सोशल मीडिया पर छिड़ी सैलरी बनाम सेविंग की बहस
नितिन के वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने अमेरिका और भारत की लाइफस्टाइल को लेकर अपनी राय रखनी शुरू कर दी. कई लोगों ने कहा कि अमेरिका में कमाई भले ज्यादा हो, लेकिन वहां का खर्च भी उसी हिसाब से बढ़ जाता है. एक यूजर ने कहा कि अमेरिका में महंगाई और खर्च ज्यादा होने के बावजूद वहां बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, करप्शन फ्री सिस्टम और अच्छी इमरजेंसी सर्विस जैसी सुविधाएं मिलती हैं. हालांकि, नौकरी जाने की स्थिति में खर्च संभालना भारत के मुकाबले ज्यादा मुश्किल हो सकता है. वहीं, कुछ लोगों ने नितिन की तुलना को पूरी तरह सही नहीं माना. उनका कहना था कि भारत और अमेरिका में सिर्फ सैलरी की तुलना करने के बजाय लाइफस्टाइल, सुविधाओं, टैक्स, प्रॉपर्टी और परिवार की कुल इनकम को भी देखना चाहिए.
ज्यादा कमाई का मतलब ज्यादा अमीर होना नहीं
नितिन मल्होत्रा की कहानी एक बड़ी बात सामने रखती है. किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति समझने के लिए उसकी सैलरी से ज्यादा जरूरी है कि महीने के आखिर में उसके पास कितना पैसा बच रहा है. अमेरिका में 8,000 डॉलर की मंथली इनकम सुनने में काफी बड़ी लग सकती है, लेकिन होम लोन, टैक्स, कार इंश्योरेंस, हेल्थ इंश्योरेंस, खाना और दूसरे खर्च मिलकर इसका बड़ा हिस्सा खत्म कर देते हैं. वहीं, भारत में कम कमाई के बावजूद कम खर्च के कारण सेविंग का हिस्सा बड़ा हो सकता है. हालांकि, यह नितिन मल्होत्रा का व्यक्तिगत अनुभव और बजट है. हर NRI या हर अमेरिकी परिवार के खर्च और कमाई का हिसाब अलग हो सकता है. इसलिए इसे अमेरिका में रहने वाले सभी भारतीयों की आर्थिक स्थिति का पैमाना नहीं माना जा सकता.




