फारुख अब्दुल्ला को पाकिस्तान से नहीं, भारत सरकार से शिकायत है. और शिकायत इस हद तक कि पाकिस्तान को कश्मीरियों का रक्षक बता रहे हैं. सवाल लाजिमी है. जो पाकिस्तान दशकों से भारत में आतंकवाद का जिम्मेदार है, उसी की हिमायत क्यों? फारुख ने पहली बार ऐसा नहीं किया है. कभी भारत को पाकिस्तान के परमाणु बम का खौफ दिखाया. कभी पीओके पर भारत के दावे को अव्यावहारिक बताया. अब वे और आगे बढ़ गए हैं.

पाकिस्तान के लिए कश्मीर अंतरराष्ट्रीय राजनीति का हथियार है. वह हर मंच पर इसे उठाता है. हाल में मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी ने भी उसके सुर में सुर मिलाया. भारत ने कड़ा विरोध किया. इसी बीच फारुख का बयान आया. उन्होंने पाकिस्तान को कश्मीरियों का रक्षक बताया. यह महज राजनीतिक बयान नहीं है. इसकी टाइमिंग पर गौर करना चाहिए. इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

ओआईसी की मुहिम, फारुख का समर्थन

1718 अक्टूबर 2026 को बगदाद में मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी के विदेश मंत्रियों का 52वां सम्मेलन हुआ. हमेशा की तरह वहां भी पाकिस्तान ने कश्मीर का मुद्दा उठाया. संगठन ने जम्मूकश्मीर पर प्रस्ताव पारित किया. भारत ने सिरे से इसे खारिज कर दिया. विदेश मंत्रालय ने प्रस्ताव को दुर्भावनापूर्ण, पक्षपातपूर्ण और झूठा बताया.

आरोप लगाया कि पाकिस्तान ओआईसी का इस्तेमाल अपने एजेंडे के लिए कर रहा है. दोहराया कि जम्मूकश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न अंग हैं. महज छह दिन बाद, 24 अक्टूबर को बारामूला में नेशनल कांफ्रेंस के कार्यक्रम में फारुख अब्दुल्ला ने पाकिस्तान की तारीफ की. कहा कि शहबाज शरीफ हर जगह कश्मीर का मुद्दा उठाते हैं. इससे कश्मीरियों की हिफाजत हो रही है.

फारुख अब्दुल्ला.

दिल्ली के इरादों पर भी उन्होंने सवाल उठाए. पाकिस्तान कश्मीर को भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाता है. भारत इसे अपना आंतरिक मामला मानता है. ऐसे समय में फारुख पाकिस्तान की मुहिम को कश्मीरियों की सुरक्षा से जोड़ते हैं. पाकिस्तान के माफिक कश्मीर के एक सीनियर लीडर के बयान के क्या मायने हैं ?

दिल्ली से शिकायत, पाकिस्तान पर भरोसा?

बारामूला में फारुख ने कहा कि दिल्ली से क्या उम्मीद की जा सकती है? क्या वहां से न्याय मिलेगा? उन्होंने कश्मीरियों को अपनी पहचान और अधिकारों के लिए खड़े होने को कहा. चेतावनी दी कि वे एकजुट नहीं हुए तो उनकी पहचान मिट सकती है. इसी कार्यक्रम में उन्होंने भाजपा शासित राज्यों में बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ मुसलमानों से एकजुट होने की अपील भी की.

केंद्र सरकार की आलोचना वे कर सकते हैं. कश्मीर की पहचान, अधिकार, पूर्ण राज्य का दर्जा और अनुच्छेद 370 की बहाली राजनीतिक बहस के विषय हैं. फारुख इन मुद्दों पर अपना पक्ष रख सकते हैं. लेकिन भारत सरकार पर अविश्वास जताने के लिए पाकिस्तान को रक्षक बता कर वे क्या कहना चाहते हैं? क्या पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय मुहिम से कश्मीरियों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है? क्या कश्मीर के लोगों के हित और पाकिस्तान के हित एक ही हैं? दशकों से आतंकवादी करतूतों से कश्मीरियों का खून बहाने वाला पाकिस्तान कबसे और कैसे कश्मीरियों का रक्षक हितैषी हो गया?

2017: पीओके पर विवादित बयान

फारुख के बयान पहले भी विवादों के केंद्र में रहे हैं. 21 जुलाई 2017 को उन्होंने कश्मीर विवाद के समाधान के लिए अमेरिका और चीन जैसे देशों की मध्यस्थता का सुझाव दिया था. भारत का रुख स्पष्ट है. जम्मूकश्मीर उसका अभिन्न अंग है. वह किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करता. 11 नवंबर 2017 को फारुख ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके पर टिप्पणी की. कहा कि पीओके पाकिस्तान के पास है और युद्ध से यह स्थिति नहीं बदलेगी. बयान पर विवाद हुआ.युद्ध से बचने की बात अपनी जगह है. लेकिन किसी क्षेत्र पर अवैध कब्जे को चुनौती देना और युद्ध को समाधान न मानना अलगअलग बातें हैं.

भारत पीओके पर पाकिस्तान के कब्जे को अवैध मानता है. फारुख के बयान में इस दावे को लेकर संदेह झलकता है. पीओके कब और कैसे भारत के नियंत्रण में आएगा, यह अलग सवाल है. लेकिन किसी मुश्किल मकसद को हासिल करने की चुनौती से डर क्या देश अपना वैध दावा छोड़ सकता है ? फारुख की दलील में इसी फर्क की अनदेखी दिखती है.

पाकिस्तान के परमाणु बम का खौफ

6 मई 2024 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि पीओके के लोग खुद भारत में शामिल होने की मांग कर सकते हैं. जवाब में फारुख ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का हवाला दिया. कहा कि पाकिस्तान ने चूड़ियां नहीं पहन रखी हैं. उसके पास परमाणु बम हैं. दुर्भाग्य से वह हम पर भी गिर सकता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। परमाणु युद्ध के विनाशकारी नतीजों से इनकार नहीं कर सकता. लेकिन बयान का संदर्भ भी मायने रखता है.

भारत के रक्षा मंत्री पीओके की वापसी की संभावना जता रहे थे. जवाब में फारुख ने पाकिस्तान की परमाणु ताकत का खौफ दिखाया. भारत के दावे के जवाब में पाकिस्तान की ताकत का डर दिखाना फारुख की मंशा पर सवाल खड़ा करता है. क्या पाकिस्तान के परमाणु हथियार भारत की नीति तय करेंगे? क्या युद्ध के खतरे से डर पीओके पर भारत अपना दावा भूल जाए? फारुख युद्ध का विरोध कर सकते हैं. लेकिन युद्ध से बचने के लिए पाकिस्तान की ताक़त का हवाला देकर फारुख सवालों में घिरते हैं.

आतंकवाद पर पाकिस्तान का हवाला

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में आतंकी हमले के बाद फारुख ने आतंकवाद की निंदा की थी. उन्होंने स्थानीय लोगों से इसके खिलाफ एकजुट होने की अपील भी की. लेकिन अगस्त 2025 में उन्होंने कहा कि भारतपाकिस्तान के संबंध सुधरे बिना जम्मूकश्मीर में आतंकवाद खत्म नहीं होगा. पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद दोनों देशों के संबंधों को लगातार खराब कर रहा है.

फारुख आतंकवाद का विरोध करते हैं. युद्ध को समाधान नहीं मानते. फिर भी पाकिस्तान की भूमिका पर खामोश रहते हैं. दूसरी तरफ भारत सरकार के प्रति अविश्वास व्यक्त करने का वे कोई मौका नहीं छोड़ते. इस हद तक कि अब पाकिस्तान उन्हें कश्मीरियों की हिफाजत करता नजर आ रहा है. यह विरोधाभास मामूली नहीं है. पाकिस्तान की कश्मीर नीति की तारीफ करके फारुख उस मुल्क को मजबूती दे रहे हैं , जो लगातार भारतीय और कश्मीरियों का खून बहा रहा है.

Baramulla, Jammu and Kashmir: National Conference President Farooq Abdullah says, “They are completely independent. When I saw those documents, what can you expect from Delhi? Do you expect them to deliver justice for you? Have the courage to fight, or you will be wiped out, and your identity will disappear. They are silent today because of the pressure from the world. Our neighbour is constantly after them. He goes everywhere saying that the Kashmir issue has not been resolved. He is protecting us; otherwise, their intentions are not good.”

— IANS October 24, 2026

कश्मीरी पंडितों पर टिप्पणी और सफाई

मई 2025 में फारुख ने कश्मीरी पंडितों के पलायन और उनके साथ हुई हिंसा पर बेहद असंवेदनशील बात कही थी. एक साक्षात्कार में उन्होंने 1990 के नरसंहार के संदर्भ में कहा था, If it happened, so be it.. बयान की तीखी आलोचना हुई. बाद में उन्होंने सफाई दी. आतंकवाद से संबंध होने से इनकार किया. कहा कि वे न पहले पाकिस्तानी थे, न भविष्य में होंगे. तब कश्मीर को भारत का ताज भी बताया था.

यहां फारुख के बयानों का दूसरा पहलू सामने आता है. विवाद बढ़ता है तो वे अपनी भारतीय पहचान और आतंकवाद के विरोध को रेखांकित करते हैं. लेकिन सफाई से उनके विवादित बयानों से हुआ नुकसान खत्म नहीं होता.फारुख अब्दुल्ला को केंद्र सरकार की आलोचना करने का पूरा अधिकार है. वे अनुच्छेद 370 की बहाली मांगें या पूर्ण राज्य के दर्जे के लिए संघर्ष करें. यह लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है. लेकिन पाकिस्तान को कश्मीरियों का रक्षक बताने पर उनकी देश के प्रति निष्ठा पर सवाल उठेंगे.

दिल्ली के प्रति गरम लेकिन पाकिस्तान के लिए नरम क्यों? कश्मीरियों के अधिकारों की लड़ाई भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर लड़ी जाएगी या पाकिस्तान की कश्मीर नीति को उसका सहारा माना जाएगा? फारुख को अपनी राजनीति का यह विरोधाभास दूर करना होगा.