Banbhoolpura Atikraman: के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा में पर का मामला एक बार फिर चर्चा में है। करीब 78 एकड़ जमीन से जुड़े इस विवाद पर आज फैसला सुनाने वाला है। जिसे लेकर इलाके में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। वहीं  संवेदनशील स्थानों पर पुलिस बल तैनात किया गया है।

बता दें कि, इस जमीन पर हजारों घर बने हुए हैं। जिसमें   करीब 50 हजार लोगों की आबादी रहती है। इलाके में 3500 से ज्यादा मकानों के अलावा मस्जिद और मदरसे भी हैं। ऐसे में कोर्ट के फैसले का असर बड़ी संख्या में परिवारों पर पड़ सकता है।

आखिर क्या है पूरा विवाद?

यह पूरा मामला की करीब 30 हेक्टेयर यानी 78 एकड़ जमीन से जुड़ा है। रेलवे का दावा है कि इस जमीन पर लंबे समय से कर मकान बनाए गए हैं। विवाद उस समय ज्यादा बढ़ा, जब ने गौला नदी में अवैध खनन से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए। इसके बाद रेलवे ने जमीन पर अपना मालिकाना हक बताते हुए वहां रहने वाले लोगों को जगह खाली करने के नोटिस जारी किए। इसके खिलाफ स्थानीय लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए।

रेलवे के दस्तावेज बनाम नजूल जमीन का दावा

रेलवे का कहना है कि उसके पास 1959 का नोटिफिकेशन , 1971 का राजस्व रिकॉर्ड और 2017 की सर्वे रिपोर्ट है। रेलवे के अनुसार, ये दस्तावेज जमीन पर उसके अधिकार को साबित करते हैं। दूसरी तरफ स्थानीय लोगों का दावा है कि शुरुआत में विवाद करीब 29 एकड़ जमीन को लेकर था, लेकिन बाद में रेलवे ने पूरे 78 एकड़ क्षेत्र पर अपना दावा कर दिया। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि कई परिवार यहां 100 साल से भी ज्यादा समय से रह रहे हैं। उनका दावा है कि यह जमीन रेलवे की नहीं, बल्कि राज्य सरकार की नजूल जमीन है। वे चाहते हैं कि सरकार जमीन को फ्रीहोल्ड कर उनकी रिहाइश को कानूनी मान्यता दे।

क्या होती है नजूल जमीन?

नजूल जमीन ऐसी सरकारी जमीन होती है, जिसका मालिकाना हक सरकार के पास रहता है। आम तौर पर ऐसी जमीन को सरकार तय नियमों के तहत लीज पर देती है। नजूल जमीन पर बिना सरकारी अनुमति के स्थायी निर्माण करना या उसका मनमाने तरीके से इस्तेमाल करना संभव नहीं होता। ऐतिहासिक रूप से अंग्रेजी शासन के दौरान जब्त की गई कई जमीनें बाद में सरकारी नियंत्रण में आ गईं। स्वतंत्रता के बाद ऐसी जमीनों का इस्तेमाल सार्वजनिक सुविधाओं और आवास जैसी जरूरतों के लिए किया जाता रहा। नजूल लैंड्स रूल्स, 1956 Rules, 1956) के तहत ऐसी जमीन का इस्तेमाल अस्पताल , स्कूल , पंचायत भवन और हाउसिंग सोसायटी जैसे कामों के लिए किया जा सकता है।

8 फरवरी 2024 की हिंसा ने बढ़ाया तनाव

बनभूलपुरा का विवाद सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं रहा। 8 फरवरी 2024 को अतिक्रमण और अवैध निर्माण हटाने पहुंची प्रशासन और नगर निगम की टीम का स्थानीय लोगों ने विरोध किया। इसके बाद इलाके में पथराव , आगजनी और हिंसा की घटनाएं हुईं। हिंसा में सरकारी और नगर निगम की संपत्ति को नुकसान पहुंचा था। इसके बाद नगर निगम ने मामले के मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक को करीब 2.45 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई के लिए रिकवरी नोटिस जारी किया था। हिंसा के बाद इलाके में कर्फ्यू लगाया गया और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई।

कई परिवारों ने छोड़ा था इलाका

हिंसा के बाद बनभूलपुरा में तनाव का असर आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ा। रिपोर्टों के मुताबिक, डर और असुरक्षा के माहौल के बीच 500 से ज्यादा मुस्लिम परिवारों ने इलाके से पलायन करना शुरू कर दिया था। कई परिवार अपना सामान लेकर दूसरी जगह जाते हुए नजर आए थे।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय तक सुनवाई चली। अदालत के सामने मुख्य सवाल जमीन के मालिकाना हक , वहां रह रहे परिवारों के अधिकार और संभावित विस्थापन से जुड़ा रहा। 24 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित जमीन को रेलवे की जमीन माना था। अदालत ने कहा था कि रेलवे अपने अधिकार क्षेत्र वाली जमीन का इस्तेमाल अपने हिसाब से कर सकता है और याचिकाकर्ता या स्थानीय निवासी उसी जगह पर बने रहने का दावा नहीं कर सकते।

प्रभावित परिवारों के लिए राहत का प्रावधान

सुप्रीम कोर्ट ने प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और आर्थिक मदद को लेकर भी निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि रेलवे और स्थानीय प्रशासन पहले उन परिवारों की पहचान करें, जो कार्रवाई से सीधे प्रभावित होंगे। पात्र विस्थापित परिवारों को छह महीने तक हर महीने 2,000 रुपये की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान किया गया था, ताकि वे तत्काल रहने की व्यवस्था कर सकें। इसके अलावा स्थायी पुनर्वास के लिए जिला प्रशासन, राजस्व प्राधिकरण और रेलवे को मिलकर काम करने के निर्देश दिए गए थे। बनभूलपुरा में पुनर्वास केंद्र बनाए जाने की बात भी आदेश में कही गई थी।

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आज के फैसले पर सबकी नजर

अब सुप्रीम कोर्ट के आज आने वाले फैसले पर सभी की निगाहें टिकी हैं। मामला सिर्फ रेलवे की जमीन और अतिक्रमण तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे हजारों परिवारों के घर और भविष्य का सवाल भी जुड़ा है। एक तरफ रेलवे अपनी जमीन पर अधिकार और उसके इस्तेमाल की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ स्थानीय लोग जमीन को नजूल बताकर अपने घर बचाने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस पूरे विवाद की आगे की दिशा तय कर सकता है।

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